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Titre
6 JUILLET 2017. - Loi portant simplification, harmonisation, informatisation et modernisation de dispositions de droit civil et de procédure civile ainsi que du notariat, et portant diverses mesures en matière de justice

Source :
JUSTICE
Publication : 24-07-2017 numéro :   2017030652 page : 75168   IMAGE
Dossier numéro : 2017-07-06/24
Entrée en vigueur : 03-08-2017 (Art.246,c)    ***    03-08-2017 (Art.321)    ***    03-08-2017 (Art.241)    ***    03-08-2017 (Art.314)    ***    01-01-2020 (Art.10)    ***    03-08-2017 (Art.161)    ***    indéterminée (Art.116)    ***    03-08-2017 (Art.234)    ***    03-08-2017 (Art.307)    ***    03-08-2017 (Art.154)    ***    03-08-2017 (Art.227)    ***    03-08-2017 (Art.147)    ***    01-01-2018 (Art.50)    ***    03-08-2017 (Art.80)    ***    01-01-2019 (Art.246,d)    ***    03-08-2017 (Art.73)    ***    03-08-2017 (Art.66)    ***    01-01-2020 (Art.196)    ***    01-01-2020 (Art.6)    ***    01-07-2014 (Art.282)    ***    03-08-2017 (Art.104)    ***    03-08-2017 (Art.278)    ***    03-08-2017 (Art. 33)    ***    03-08-2017 (Art.198)    ***    indéterminée (Art.8)    ***    indéterminée (Art.1-Art.10)    ***    indéterminée (Art.38)    ***    03-08-2017 (Art.242)    ***    03-08-2017 (Art.315)    ***    03-08-2017 (Art.162)    ***    17-08-2015 (Art.57)    ***    indéterminée (Art.117)    ***    03-08-2017 (Art.235)    ***    03-08-2017 (Art.308)    ***    03-08-2017 (Art.155)    ***    03-08-2017 (Art.228)    ***    03-08-2017 (Art.148)    ***    24-07-2017 (Art.208)    ***    03-08-2017 (Art.81)    ***    01-01-2020 (Art.110)    ***    01-01-2019 (Art.246,e)    ***    03-08-2017 (Art.74)    ***    03-08-2017 (Art.293)    ***    03-08-2017 (Art.67)    ***    01-01-2020 (Art.7)    ***    03-08-2017 (Art.105)    ***    01-01-2019 (Art.289)    ***    03-08-2017 (Art.279)    ***    03-08-2017 (Art.199)    ***    indéterminée (Art.9)    ***    03-08-2017 (Art.250)    ***    03-08-2017 (Art.170)    ***    03-08-2017 (Art.243)    ***    03-08-2017 (Art.316)    ***    01-01-2020 (Art.12)    ***    03-08-2017 (Art.163)    ***    03-08-2017 (Art.236)    ***    indéterminée (Art.10)    ***    03-08-2017 (Art.309)    ***    03-08-2017 (Art.156)    ***    03-08-2017 (Art.229)    ***    03-08-2017 (Art.149)    ***    24-07-2017 (Art.209)    ***    03-08-2017 (Art.82)    ***    01-01-2020 (Art.111)    ***    03-08-2017 (Art.200)    ***    03-08-2017 (Art.75)    ***    03-08-2017 (Art.120)    ***    03-08-2017 (Art.294)    ***    03-08-2017 (Art.68)    ***    indéterminée (Art.249)    ***    01-01-2020 (Art.8)    ***    01-07-2014 (Art.284)    ***    03-08-2017 (Art.106)    ***    03-08-2017 (Art.246,f)    ***    03-08-2017 (Art.251)    ***    01-01-2020 (Art.20)    ***    03-08-2017 (Art.244)    ***    03-08-2017 (Art.317)    ***    01-01-2020 (Art.13)    ***    03-08-2017 (Art.164)    ***    17-08-2015 (Art.59)    ***    03-08-2017 (Art.237)    ***    03-08-2017 (Art.157)    ***    03-08-2017 (Art.90)    ***    03-08-2017 (Art.83)    ***    01-01-2020 (Art.112)    ***    01-01-2019 (Art.246,g)    ***    03-08-2017 (Art.76)    ***    indéterminée (Art.14-Art.32)    ***    03-08-2017 (Art.121)    ***    03-08-2017 (Art.295)    ***    03-08-2017 (Art.69)    ***    03-08-2017 (Art.259,1°)    ***    01-01-2020 (Art.9)    ***    01-07-2014 (Art.285)    ***    03-08-2017 (Art.288)    ***    03-08-2017 (Art.33)    ***    03-08-2017 (Art.252)    ***    03-08-2017 (Art.172)    ***    01-01-2020 (Art.21)    ***    03-08-2017 (Art.245)    ***    03-08-2017 (Art.318)    ***    03-08-2017 (Art.165)    ***    03-08-2017 (Art.238)    ***    indéterminée (Art.12)    ***    03-08-2017 (Art.158)    ***    03-08-2017 (Art.91)    ***    03-08-2017 (Art.84)    ***    01-01-2020 (Art.113)    ***    03-08-2017 (Art.202)    ***    indéterminée (Art.34-Art.38)    ***    03-08-2017 (Art.77)    ***    03-08-2017 (Art.296)    ***    01-07-2014 (Art.286)    ***    indéterminée (Art.49)    ***    01-01-2019 (Art.259,2°)    ***    03-08-2017 (Art.180)    ***    03-08-2017 (Art.253)    ***    03-08-2017 (Art.173)    ***    01-01-2020 (Art.22)    ***    indéterminée (Art.107,2°)    ***    indéterminée (Art.20)    ***    03-08-2017 (Art.319)    ***    03-08-2017 (Art.166)    ***    03-08-2017 (Art.239)    ***    01-01-2019 (Art.249)    ***    indéterminée (Art.13)    ***    03-08-2017 (Art.159)    ***    03-08-2017 (Art.92)    ***    03-08-2017 (Art.85)    ***    01-01-2020 (Art.114)    ***    03-08-2017 (Art.130)    ***    03-08-2017 (Art.203)    ***    03-08-2017 (Art.78)    ***    03-08-2017 (Art.297)    ***    indéterminée (Art.109-117)    ***    01-07-2014 (Art.287)    ***    03-08-2017 (Art.181)    ***    01-01-2020 (Art.30)    ***    03-08-2017 (Art.254)    ***    03-08-2017 (Art.174)    ***    01-01-2020 (Art.23)    ***    03-08-2017 (Art.247)    ***    indéterminée (Art.21)    ***    01-01-2020 (Art.16)    ***    03-08-2017 (Art.167)    ***    03-08-2017 (Art.189,i-189,iv)    ***    03-08-2017 (Art.93)    ***    03-08-2017 (Art.86)    ***    01-01-2020 (Art.115)    ***    03-08-2017 (Art.131)    ***    01-01-2018 (Art.49)    ***    03-08-2017 (Art.79)    ***    03-08-2017 (Art.124)    ***    03-08-2017 (Art.298)    ***    03-08-2017 (Art.182)    ***    01-01-2020 (Art.31)    ***    03-08-2017 (Art.255)    ***    03-08-2017 (Art.175)    ***    01-01-2020 (Art.24)    ***    03-08-2017 (Art.248)    ***    indéterminée (Art.22)    ***    03-08-2017 (Art.168)    ***    03-08-2017 (Art.94)    ***    03-08-2017 (Art.212)    ***    01-01-2020 (Art.116)    ***    03-08-2017 (Art.132)    ***    03-08-2017 (Art.125)    ***    03-08-2017 (Art.299)    ***    03-08-2017 (Art.118)    ***    03-08-2017 (Art.270)    ***    01-07-2014 (Art.260)    ***    03-08-2017 (Art.183)    ***    01-01-2020 (Art.32)    ***    03-08-2017 (Art.256)    ***    indéterminée (Art.30)    ***    03-08-2017 (Art.108,1°)    ***    03-08-2017 (Art.176)    ***    indéterminée (Art.23)    ***    03-08-2017 (Art.169)    ***    01-01-2020 (Art.18)    ***    indéterminée (Art.16)    ***    03-08-2017 (Art.300)    ***    03-08-2017 (Art.220)    ***    03-08-2017 (Art.95)    ***    03-08-2017 (Art.140)    ***    03-08-2017 (Art.213)    ***    03-08-2017 (Art.88)    ***    01-01-2020 (Art.117)    ***    03-08-2017 (Art.133)    ***    01-01-2019 (Art.246,a°)    ***    01-01-2020 (Art.108,2°)    ***    03-08-2017 (Art.52)    ***    03-08-2017 (Art.271)    ***    indéterminée (Art.246,d)    ***    03-08-2017 (Art.264)    ***    01-07-2014 (Art.261)    ***    03-08-2017 (Art.184)    ***    21-06-2012 (Art.51)    ***    03-08-2017 (Art.257)    ***    indéterminée (Art.31)    ***    03-08-2017 (Art.177)    ***    01-01-2020 (Art.26)    ***    indéterminée (Art.24)    ***    01-01-2020 (Art.19)    ***    indéterminée (Art.110)    ***    03-08-2017 (Art.301)    ***    03-08-2017 (Art.221)    ***    03-08-2017 (Art.141)    ***    03-08-2017 (Art.214)    ***    03-08-2017 (Art.89)    ***    03-08-2017 (Art.134)    ***    01-01-2020 (Art.189,v-189,vii)    ***    01-01-2020 (Art.189,v-Art.189,vii)    ***    03-08-2017 (Art.53)    ***    indéterminée (Art.246,e)    ***    03-08-2017 (Art.192)    ***    03-08-2017 (Art.265)    ***    03-08-2017 (Art.39)    ***    indéterminée (Art.2)    ***    01-07-2014 (Art.262)    ***    03-08-2017 (Art.185)    ***    01-01-2020 (Art.34)    ***    03-08-2017 (Art.258)    ***    indéterminée (Art.32)    ***    03-08-2017 (Art.178)    ***    01-01-2020 (Art.27)    ***    indéterminée (Art.18)    ***    indéterminée (Art.111)    ***    03-08-2017 (Art.302)    ***    indéterminée (Art.259,2°)    ***    03-08-2017 (Art.142)    ***    29-02-2016 (Art.206)    ***    03-08-2017 (Art.215)    ***    03-08-2017 (Art.135)    ***    03-08-2017 (Art.128)    ***    03-08-2017 (Art.280)    ***    03-08-2017 (Art.54)    ***    03-08-2017 (Art.273)    ***    03-08-2017 (Art.193)    ***    03-08-2017 (Art.266)    ***    01-07-2014 (Art.263)    ***    indéterminée (Art.3)    ***    indéterminée (Art.40)    ***    03-08-2017 (Art.186)    ***    01-01-2020 (Art.35)    ***    01-01-2020 (Art.28)    ***    03-08-2017 (Art.171,1°)    ***    03-08-2017 (Art.179)    ***    indéterminée (Art.26)    ***    03-08-2017 (Art.11)    ***    03-08-2017 (Art.310)    ***    indéterminée (Art.19)    ***    indéterminée (Art.112)    ***    03-08-2017 (Art.230)    ***    03-08-2017 (Art.303)    ***    03-08-2017 (Art.150)    ***    03-08-2017 (Art.223)    ***    03-08-2017 (Art.98)    ***    03-08-2017 (Art.143)    ***    03-08-2017 (Art.216)    ***    03-08-2017 (Art.136)    ***    03-08-2017 (Art.129)    ***    01-01-2020 (Art.171,2°)    ***    01-01-2020 (Art.2)    ***    03-08-2017 (Art.281)    ***    03-08-2017 (Art.55)    ***    03-08-2017 (Art.100)    ***    03-08-2017 (Art.274)    ***    03-08-2017 (Art.48)    ***    17-12-2009 (Art.60,2°)    ***    03-08-2017 (Art.194)    ***    indéterminée (Art.246,g)    ***    03-08-2017 (Art.267)    ***    indéterminée (Art.4)    ***    indéterminée (Art.41)    ***    03-08-2017 (Art.187)    ***    01-01-2020 (Art.36)    ***    indéterminée (Art.34)    ***    01-01-2020 (Art.29)    ***    indéterminée (Art.27)    ***    03-08-2017 (Art.311)    ***    indéterminée (Art.113)    ***    03-08-2017 (Art.231)    ***    03-08-2017 (Art.304)    ***    03-08-2017 (Art.151)    ***    03-08-2017 (Art.224)    ***    03-08-2017 (Art.99)    ***    03-08-2017 (Art.144)    ***    03-08-2017 (Art.217)    ***    03-08-2017 (Art.137)    ***    03-08-2017 (Art.70)    ***    03-08-2017 (Art.63)    ***    01-01-2020 (Art.3)    ***    03-08-2017 (Art.56)    ***    03-08-2017 (Art.275)    ***    01-07-2014 (Art.284-Art.287)    ***    03-08-2017 (Art.268)    ***    indéterminée (Art.42)    ***    indéterminée (Art.5)    ***    01-01-2020 (Art.37)    ***    03-08-2017 (Art.188)    ***    indéterminée (Art.35)    ***    indéterminée (Art.28)    ***    03-08-2017 (Art.13)    ***    03-08-2017 (Art.312)    ***    indéterminée (Art.114)    ***    03-08-2017 (Art.232)    ***    03-08-2017 (Art.305)    ***    03-08-2017 (Art.152)    ***    03-08-2017 (Art.225)    ***    03-08-2017 (Art.145)    ***    03-08-2017 (Art.218)    ***    03-08-2017 (Art.138)    ***    03-08-2017 (Art.107,1°)    ***    03-08-2017 (Art.71)    ***    03-08-2017 (Art.64)    ***    01-01-2020 (Art.4)    ***    03-08-2017 (Art.283)    ***    03-08-2017 (Art.102)    ***    03-08-2017 (Art.276)    ***    indéterminée (Art.246,a°)    ***    indéterminée (Art.50)    ***    03-08-2017 (Art.269)    ***    indéterminée (Art.43)    ***    indéterminée (Art.6)    ***    01-01-2020 (Art.38)    ***    indéterminée (Art.36)    ***    03-08-2017 (Art.246,b)    ***    03-08-2017 (Art.320)    ***    01-01-2020 (Art.107,2°)    ***    indéterminée (Art.29)    ***    03-08-2017 (Art.240)    ***    03-08-2017 (Art.313)    ***    03-08-2017 (Art.160)    ***    indéterminée (Art.115)    ***    03-08-2017 (Art.233)    ***    indéterminée (Art.289)    ***    03-08-2017 (Art.306)    ***    03-08-2017 (Art.153)    ***    01-07-2014 (Art.260-Art.263)    ***    03-08-2017 (Art.146)    ***    03-08-2017 (Art.219)    ***    03-08-2017 (Art.139)    ***    03-08-2017 (Art.72)    ***    03-08-2017 (Art.65)    ***    indéterminée (Art.108,2°)    ***    01-01-2020 (Art.195)    ***    01-01-2020 (Art.5)    ***    03-08-2017 (Art.58)    ***    03-08-2017 (Art.103)    ***    01-01-2020 (Art.109-Art.117)    ***    03-08-2017 (Art.277)    ***    03-08-2017 (Art.197)    ***    indéterminée (Art.40-46)    ***    indéterminée (Art.44)    ***    17-08-2015 (Art.60,1°)    ***    indéterminée (Art.7)    ***    indéterminée (Art.37)

Table des matières Texte Début
TITRE Ier. - Disposition générale
Art. 1
TITRE 2. - Modification de certaines dispositions du Code civil et du Code judiciaire relatives à l'adoption, notamment en vue d'introduire un jugement d'aptitude préalable dans la procédure d'adoption interne
CHAPITRE 1er. - Modifications du Code civil
Art. 2-12
CHAPITRE 2. - Modifications du Code judiciaire
Art. 13-17
Sous-section 2. - De la procédure en constatation de l'aptitude à adopter".
Art. 18-44
CHAPITRE 3. - Dispositions finales
Section 1re. - Dispositions transitoires
Art. 45-46
Section 2. - Entrée en vigueur
Art. 47
TITRE 3. - Modification de l'article 2277 du Code civil concernant la prescription des créances pour la fourniture de biens et de services via des réseaux de distribution d'eau, de gaz ou d'électricité ou la fourniture de services de communications électroniques ou de services de radiotransmission ou de radio- et télédiffusion via des réseaux de communications électroniques
Art. 48
TITRE 4. - Modifications de la loi du 16 juillet 2004 portant le Code de droit international privé
CHAPITRE 1er. - Nom et prénoms
Art. 49-39
CHAPITRE 2. - Adaptation du Code de droit international privé à différents règlements européens
Section 1re. - Règlement (UE) n° 1259/2010 du Conseil du 20 décembre 2010 mettant en oeuvre une coopération renforcée dans le domaine de la loi applicable au divorce et à la séparation de corps
Art. 51
Section 2. - Règlement (CE) n° 4/2009 du Conseil du 18 décembre 2008 relatif à la compétence, la loi applicable, la reconnaissance et l'exécution des décisions et la coopération en matière d'obligations alimentaires et protocole de La Haye du 23 novembre 2007 sur la loi applicable aux obligations alimentaires
Art. 52-75
Section 3. - Règlement (UE) n° 650/2012 du Parlement européen et du Conseil du 4 juillet 2012 relatif à la compétence, la loi applicable, la reconnaissance et l'exécution des décisions et l'acceptation et l'exécution des actes authentiques en matière de successions et à la création d'un certificat successoral européen
Art. 55-57
Section 4. - Règlement (CE) n° 593/2008 du Parlement européen et du Conseil du 17 juin 2008 sur la loi applicable aux obligations contractuelles (Rome I)
Art. 58
Section 5. - Dispositions transitoires du Code de droit international privé
Art. 59-60
CHAPITRE 3. - Disposition transitoire
Art. 61
CHAPITRE 4. - Entrée en vigueur
Art. 62
TITRE 5. - Modifications diverses en matière de droit de la famille et relatives au tribunal de la famille
CHAPITRE 1er. - Modifications du Code civil
Art. 63-70
CHAPITRE 2. - Modifications du Code judiciaire
Section 1re. - Dispositions modificatives
Art. 71-86
Section 2. - Disposition transitoire
Art. 87
CHAPITRE 3. - Modifications de la loi du 16 juillet 2004 portant le Code de droit international privé
Art. 88-89
CHAPITRE 4. - Modifications du Code consulaire
Art. 90-93
CHAPITRE 5. - Modification du Code de la nationalité belge
Art. 94
TITRE 6. - Legs
CHAPITRE 1er. - Modification du Code civil
Art. 95
CHAPITRE 2. - Modification du décret impérial du 18 février 1809 relatif aux congrégations ou maisons hospitalières de femmes
Art. 96
CHAPITRE 3. - Modification du décret impérial du 6 novembre 1813 sur la conservation et administration des biens que possède le clergé dans plusieurs parties de l'Empire
Art. 97
CHAPITRE 4. - Modifications de la loi du 27 juin 1921 sur les associations sans but lucratif, les fondations, les partis politiques européens et les fondations politiques européennes
Art. 98-100
CHAPITRE 5. - Disposition transitoire
Art. 101
TITRE 7. - Demandes concernant les mesures transfrontières relatives à la responsabilité parentale et la protection des enfants
Art. 102-106
TITRE 8. - Modifications relatives à la déclaration d'acceptation sous bénéfice d'inventaire et à la renonciation à une succession et à la création d'un registre central successoral
CHAPITRE 1er. - Modifications du Code civil relatives aux déclarations d'acceptation sous bénéfice d'inventaire d'une succession et de renonciation à une succession
Art. 107-108
CHAPITRE 2. - Introduction d'un registre central successoral
Art. 109-117
CHAPITRE 3. - Abrogation de l'article 1185 du Code judiciaire relative aux déclarations de renonciation à une succession
Art. 118
CHAPITRE 4. - Déclarations de renonciation gratuites
Section 1re. - Modification du Code des Droits d'Enregistrement, d'Hypothèque et de Greffe
Art. 119
Section 2. - Modification du Code des droits et taxes divers
Art. 120
CHAPITRE 5. - Modification de la loi du 25 ventôse an XI contenant organisation du notariat
Art. 121
CHAPITRE 6. - Disposition transitoire
Art. 122
CHAPITRE 7. - Entrée en vigueur
Art. 123
TITRE 9. - Notariat
CHAPITRE 1er. - Modifications du Code civil
Art. 124-125
CHAPITRE 2. - Abrogation de la loi du 16 floréal an IV (5 mai 1796) et de l'article 16 du Titre III du décret des 29 septembre-6 octobre 1791
Art. 126-127
TITRE 10. - Dispositions procédurales diverses
CHAPITRE 1er. - Modifications du Code judiciaire
Art. 128-159
CHAPITRE 2. - Modification du Code civil
Art. 160
CHAPITRE 3. - Modifications du Code d'instruction criminelle
Art. 161-162
TITRE 11. - Modification de la loi du 25 ventôse an XI contenant organisation du notariat et de lois diverses en vue de la modernisation et la réduction de la charge de travail de justice
CHAPITRE 1er. - Modifications de la loi du 25 ventôse an XI contenant organisation du notariat
Art. 163-196
CHAPITRE 2. - Autres modifications
Art. 197-203
CHAPITRE 3. - Dispositions transitoires
Art. 204
CHAPITRE 5. - Entrée en vigueur
Art. 205
TITRE 12. - Modification du Code d'instruction criminelle
Art. 206-207
TITRE 13. - Modification de l'article 33 et abrogation de l'article 84, alinéa 2, du Code pénal
Art. 208-210
TITRE 14. - Transposition en droit belge la Directive 2013/40/UE du Parlement européen et du Conseil du 12 août 2013 relative aux attaques contre les systèmes d'information et remplaçant la décision-cadre 2005/222/JAI du Conseil
CHAPITRE 1er. - Disposition générale
Art. 211
CHAPITRE 2. - Modifications du Code pénal
Art. 212-215
TITRE 15. - Modification de la loi du 15 mars 1874 sur les extraditions
Art. 216-217
TITRE 16. - Modification de la loi du 9 décembre 2004 sur la transmission policière internationale de données à caractère personnel et d'informations à finalité judiciaire, l'entraide judiciaire internationale en matière pénale et modifiant l'article 90ter du Code d'instruction criminelle
Art. 218
TITRE 17. - Organisation judiciaire
CHAPITRE 1er. - Modifications du Code judiciaire
Art. 219-270
CHAPITRE 2. - Modifications de la loi du 31 janvier 2007 sur la formation judiciaire et portant création de l'Institut de formation judiciaire
Art. 271-280
CHAPITRE 3. - Modifications de la loi du 10 avril 2014 modifiant certaines dispositions du Code judiciaire en vue d'instaurer une nouvelle carrière pécuniaire pour le personnel judiciaire ainsi qu'un système de mandats pour les greffiers en chef et les secrétaires en chef
Art. 281-288
CHAPITRE 4. - Dispositions transitoires
Art. 289-291
CHAPITRE 6. - Application de la loi dans le temps
Art. 292
TITRE 18. - Modifications de la loi du 5 mai 2014 relative à l'internement
Art. 293-311
TITRE 19. - Modifications du Code pénal en vue de communiquer des secrets
Art. 312-314
TITRE 20. - Modification du Code civil
Art. 315
TITRE 21. - Modification de la loi relative à la police de la circulation routière, coordonnée le 16 mars 1968, en ce qui concerne l'ordre de paiement
Art. 316
TITRE 22. - Modification de la loi du 17 mai 2006 relative au statut juridique externe des personnes condamnées à une peine privative de liberté et aux droits reconnus à la victime dans le cadre des modalités d'exécution de la peine
Art. 317
TITRE 23. - Modifications de la loi du 25 décembre 2016 modifiant diverses dispositions relatives aux sûretés réelles mobilières
Art. 318-319
TITRE 24. - Modifications du Code de droit économique
Art. 320-321

Texte Table des matières Début
TITRE Ier. - Disposition générale

  Article 1er. er>La présente loi règle une matière visée à l'article 74 de la Constitution.

  TITRE 2. - Modification de certaines dispositions du Code civil et du Code judiciaire relatives à l'adoption, notamment en vue d'introduire un jugement d'aptitude préalable dans la procédure d'adoption interne

  CHAPITRE 1er. - Modifications du Code civil

  Art. 2. Dans le livre premier, titre VIII, chapitre Ier, section 2, paragraphe 1er, C, du Code civil, il est inséré un article 346-1/1 rédigé comme suit :
  "Art. 346-1/1. La personne ou les personnes résidant habituellement en Belgique et désireuses d'adopter un enfant dont la résidence habituelle est également située en Belgique doivent, avant d'effectuer quelque démarche que ce soit en vue d'une adoption, obtenir un jugement les déclarant qualifiées et aptes à assumer une adoption.
  Par dérogation à l'alinéa 1er, l'adoptant ne doit pas obtenir un jugement le déclarant qualifié et apte à assumer une adoption avant d'entamer la procédure d'établissement de l'adoption, l'adoptant, lorsqu'il désire adopter un enfant :
  1° apparenté, jusqu'au troisième degré, à lui-même, à son conjoint, à son cohabitant ou à son ancien partenaire, même décédé; ou
  2° dont il a partagé la vie quotidienne, préalablement au projet d'adoption; ou
  3° avec lequel il a établi un lien social et affectif durable, préalablement au projet d'adoption.
  Dans ces cas, l'aptitude de l'adoptant sera appréciée par le tribunal de la famille au cours de la procédure d'établissement de l'adoption.".

  Art. 3. Dans le livre premier, titre VIII, chapitre Ier, section 2, paragraphe 1er, C, du même Code, il est inséré un article 346-1/2 rédigé comme suit :
  "Art. 346-1/2. L'aptitude est appréciée par le tribunal de la famille sur la base d'une enquête sociale, qu'il ordonne.
  Lorsque la procédure d'établissement de l'adoption concerne un enfant visé à l'article 346-1/1, alinéa 2, l'enquête sociale qui est ordonnée porte à la fois sur l'aptitude du candidat adoptant et sur l'intérêt de l'enfant visé par la procédure à être adopté.
  Lorsque l'adoptant désire adopter un enfant visé à l'article 346-1/1, alinéa 2, 1°, le juge décide de l'opportunité d'ordonner ou non cette enquête sociale.
  Pour apprécier l'aptitude de l'adoptant, le tribunal tient compte, notamment, de la situation personnelle, familiale et médicale de l'intéressé, et des motifs qui l'animent.".

  Art. 4. L'article 346-2 du même Code, inséré par la loi du 24 avril 2003 et modifié par les lois des 27 décembre 2004, 20 juin 2012 et 30 juillet 2013, est remplacé par ce qui suit :
  "Art. 346-2. La personne ou les personnes désireuses d'adopter un enfant doivent dans tous les cas, préalablement à l'appréciation de leur aptitude, avoir suivi la préparation organisée par la communauté compétente, comprenant notamment une information sur les étapes de la procédure, les effets juridiques et les autres conséquences de l'adoption ainsi que sur la possibilité et l'utilité d'un suivi post-adoptif.
  La préparation susvisée n'est pas obligatoire pour l'adoptant ou les adoptants qui l'ont déjà suivie lors d'une adoption antérieure, et dont l'aptitude à adopter a été reconnue par le tribunal de la famille. La préparation ne doit pas être renouvelée dans le cadre de la procédure en prolongation du délai d'aptitude à adopter.".

  Art. 5. Dans le livre premier, titre VIII, chapitre Ier, section 2, paragraphe 1er, C, du même Code, il est inséré un article 346-2/1 rédigé comme suit :
  "Art. 346-2/1. L'autorité centrale fédérale visée à l'article 360-1, 2°, adresse, sans délai, à l'autorité centrale communautaire compétente visée à l'article 360-1, 3°, les décisions qui lui sont transmises en copie par le greffier du tribunal de la famille ou de la cour d'appel, relatives à l'aptitude, l'inaptitude ou la prolongation de l'aptitude de l'adoptant ou des adoptants, ainsi que l'avis écrit du ministère public visé à l'article 1231-1/5 du Code judiciaire.".

  Art. 6. Dans l'article 361-1, alinéa 1er, du même Code, inséré par la loi du 24 avril 2003, le mot "internationale" est abrogé.

  Art. 7. L'article 361-2 du même Code, inséré par la loi du 24 avril 2003, remplacé par la loi du 30 décembre 2009 et modifié par la loi du 30 juillet 2013, est remplacé par ce qui suit :
  "Art. 361-2. L'autorité centrale fédérale adresse, sans délai, à l'autorité centrale communautaire compétente, toutes les décisions relatives à l'aptitude, l'inaptitude ou la prolongation de l'aptitude de l'adoptant ou des adoptants qui lui sont transmises en application des articles 1231-1/8, 1231-1/14 et 1231-57 du Code judiciaire, ainsi que l'avis écrit du ministère public visé à l'article 1231-1/5 du Code judiciaire.".

  Art. 8. Dans le livre premier, titre VIII, chapitre II, section 2, paragraphe 2, du même Code, il est inséré un article 361-2/1 rédigé comme suit :
  "Art. 361-2/1. Le rapport visé à l'article 15 de la Convention destiné à mettre à la disposition de l'autorité compétente de l'Etat d'origine suffisamment de renseignements sur leur personne pour lui permettre de déterminer pour chaque enfant en besoin d'adoption, la ou les personnes qui lui offriront l'environnement le plus adéquat et les meilleures chances de bonne intégration, contient des renseignements sur leur identité, leur capacité légale, leur situation personnelle, familiale et médicale, leur milieu social, les motifs qui les animent et leur aptitude à assumer une adoption, ainsi que sur les enfants qu'ils seraient aptes à prendre en charge.
  Lorsqu'une décision prolongeant le délai d'aptitude de l'adoptant ou des adoptants modifie les conditions d'aptitude, un second rapport qui ne porte que sur les nouvelles conditions de cette décision lui est annexé.
  L'avis écrit du ministère public visé à l'article 1231-1/5 du Code judiciaire lui est également annexé.".

  Art. 9. Dans l'article 361-3, 2°, a), du même Code, inséré par la loi du 24 avril 2003, les mots "et les conceptions philosophiques de ce milieu" sont abrogés.

  Art. 10. A l'article 361-5 du même Code, inséré par la loi du 6 décembre 2005, les modifications suivantes sont apportées :
  a) au 1°, les mots "et les conceptions philosophiques de ce milieu" sont abrogés;
  b) au 3°, les mots "du rapport du ministère public, conformément à l'article 1231-33 du Code judiciaire" sont remplacés par les mots "de l'avis écrit du ministère public, conformément à l'article 1231-1/8 du Code judiciaire".

  Art. 11. Dans l'article 363-1 du même Code, inséré par la loi du 24 avril 2003 et modifié par la loi du 6 décembre 2005, l'alinéa 1er est complété par ce qui suit :
  ", et, dans ce dernier cas, que ce contact ait été autorisé par l'autorité centrale communautaire compétente en Belgique".

  Art. 12. A l'article 365-4, alinéa 1er, du même Code, inséré par la loi du 24 avril 2003 et modifié par la loi du 6 décembre 2005, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans la première phrase, les mots "est établie en double exemplaire et" sont abrogés;
  2° le 8° est abrogé.

  CHAPITRE 2. - Modifications du Code judiciaire

  Art. 13. L'article 1231-1 du Code judiciaire, inséré par la loi du 24 avril 2003 et abrogé par la loi du 2 juin 2010, est rétabli dans la rédaction suivante :
  "Art. 1231-1. Chaque fois qu'une demande portant sur la reconnaissance en Belgique d'une décision étrangère en matière d'adoption est pendante devant l'autorité centrale fédérale, ou devant la juridiction saisie du recours introduit contre la décision de l'autorité centrale fédérale, le tribunal de la famille saisi d'une requête en établissement d'une adoption concernant le même enfant ne peut statuer qu'après que la décision de l'autorité centrale fédérale n'est plus susceptible de recours ou que, en cas de recours contre cette décision, la décision de la juridiction saisie du recours est coulée en force de jugée.".

  Art. 14. Dans la quatrième partie, livre IV, chapitre VIIIbis du même Code, il est inséré une section 1rebis intitulée :
  "Section 1rebis. - Dispositions relatives à l'aptitude à adopter".

  Art. 15. Dans la section 1rebis, insérée par l'article 14, il est inséré une sous-section 1ère intitulée :
  "Sous-section 1re. - Disposition générale".

  Art. 16. Dans la sous-section 1re, insérée par l'article 15, il est inséré un article 1231-1/1 rédigé comme suit :
  "Art. 1231-1/1. La présente section s'applique dans les cas visés à l'article 346-1/1, alinéa 1er, du Code civil.".

  Art. 17. Dans la section 1rebis, insérée par l'article 14, il est inséré une sous-section 2 intitulée :

  Sous-section 2. - De la procédure en constatation de l'aptitude à adopter".

  Art. 18. Dans la sous-section 2, insérée par l'article 17, il est inséré un article 1231-1/2 rédigé comme suit :
  "Art.1231-1/2. La demande est introduite par voie de requête unilatérale devant le tribunal de la famille. La requête est déposée au greffe et signée soit par l'adoptant ou les adoptants, soit par leur avocat.
  Sont annexés à la requête :
  1° l'original ou une copie certifiée conforme des documents requis pour l'examen de la demande;
  2° le certificat attestant que la préparation organisée par la communauté compétente a été suivie.".

  Art. 19. Dans la même sous-section 2, il est inséré un article 1231-1/3 rédigé comme suit :
  "Art. 1231-1/3. § 1er. Pour que la requête soit recevable, y sont annexés, outre le certificat visé à l'article 1231-1/2, alinéa 2, 2°, une copie certifiée conforme de l'acte de naissance ou un acte équivalent, une preuve de la nationalité, une attestation de résidence habituelle de l'adoptant ou des adoptants et un extrait d'acte de mariage ou un extrait de déclaration de cohabitation légale ou encore la preuve d'une cohabitation de plus de trois ans.
  § 2. Pour autant que les intéressés respectifs soient inscrits, à la date de la requête, au Registre national des personnes physiques, créé par la loi du 8 août 1983 organisant un registre national des personnes physiques, ils sont dispensés de fournir :
  1° une copie certifiée conforme de l'acte de naissance ou un acte équivalent, pour autant qu'il s'agisse d'un acte d'une personne née en Belgique;
  2° une preuve de la nationalité;
  3° une attestation de résidence habituelle de l'adoptant ou des adoptants;
  4° un extrait de l'acte de mariage, si le mariage a été contracté en Belgique;
  5° un extrait de déclaration de cohabitation légale;
  6° la preuve d'une cohabitation de plus de trois ans.
  Les données visées à l'alinéa 1er, 2°, 3°, 5° et 6°, qui figurent dans le Registre national, font foi jusqu'à preuve du contraire. Le greffe du tribunal contrôle dans ce cas les données au moyen du Registre national et verse un extrait de celui-ci au dossier.
  Le greffe du tribunal demande lui-même une copie de l'acte visé à l'alinéa 1er, 1° et 4°, au dépositaire du registre.
  Il en va de même lorsque l'acte a été transcrit en Belgique et que le greffe connaît le lieu de sa transcription.
  § 3. Les dispositions du paragraphe 2 ne s'appliquent pas aux personnes qui sont inscrites dans le registre d'attente.
  § 4. Si les mentions de la requête sont incomplètes, ou que le greffe n'a pas pu recueillir en temps utile certaines informations, le juge invite le ou les requérants à communiquer les informations requises ou à compléter le dossier de la procédure.".

  Art. 20. Dans la même sous-section 2, il est inséré un article 1231-1/4 rédigé comme suit :
  "Art. 1231-1/4. Dans les trente jours de la requête visée à l'article 1231-1/2, le tribunal ordonne d'office, sans convocation des parties, et par ordonnance, une enquête sociale afin de l'éclairer sur l'aptitude à adopter de l'adoptant ou des adoptants. Cette ordonnance n'est susceptible ni d'opposition ni d'appel. Au cours de cette enquête sociale, les services désignés par les communautés compétentes sont consultés.
  Le rapport de l'enquête sociale est remis au greffe dans les quatre mois du prononcé de cette ordonnance. II est communiqué au ministère public.".

  Art. 21. Dans la même sous-section 2, il est inséré un article 1231-1/5 rédigé comme suit :
  "Art. 1231-1/5. Parallèlement à la réalisation de l'enquête sociale visée à l'article 1231-1/4, le ministère public procède à une enquête de moralité sur la personne de l'adoptant ou des adoptants, notamment par la consultation de leur casier judiciaire. Le ministère public vérifie la qualification à adopter des requérants et rédige un avis écrit qui est déposé au dossier de la procédure huit jours avant l'audience.".

  Art. 22. Dans la même sous-section 2, il est inséré un article 1231-1/6 rédigé comme suit :
  "Art. 1231-1/6. Dans les trois jours du dépôt au greffe du rapport de l'enquête sociale, l'adoptant ou les adoptants sont convoqués par pli judiciaire :
  1° pour prendre connaissance du rapport; ils disposent à cette fin d'un délai de quinze jours;
  2° à comparaître en personne devant le tribunal dans le mois qui suit l'expiration du délai visé au 1°. ".

  Art. 23. Dans la même sous-section 2, il est inséré un article 1231-1/7 rédigé comme suit :
  "Art. 1231-1/7. Le tribunal de la famille se prononce ensuite sur l'aptitude de l'adoptant ou des adoptants à procéder à une adoption.
  Le jugement est motivé. S'il est positif, il mentionne le nombre d'enfants que l'adoptant ou les adoptants seraient aptes à adopter, ainsi que les éventuelles restrictions à leur aptitude.
  Le jugement ne peut servir que pour une procédure en adoption d'un ou de plusieurs enfants. Sa validité expire quatre ans après son prononcé.".

  Art. 24. Dans la même sous-section 2, il est inséré un article 1231-1/8 rédigé comme suit :
  "Art. 1231-1/8. Dans les trois jours qui suivent la date à laquelle le jugement est devenu définitif, le greffier en adresse une copie à l'autorité centrale fédérale. Si le jugement conclut à l'aptitude du ou des adoptants, le greffier lui adresse également une copie de l'avis écrit du ministère public visé à l'article 1231-1/5. Le greffier en avise l'adoptant ou les adoptants.
  L'autorité centrale fédérale fait application des articles 346-2/1 et 361-2 du Code civil.".

  Art. 25. Dans la section 1rebis, insérée par l'article 14, il est inséré une sous-section 3 intitulée :
  "Sous-section 3. - De la procédure en prolongation du délai d'aptitude à adopter".

  Art. 26. Dans la sous-section 3, insérée par l'article 25, il est inséré un article 1231-1/9 rédigé comme suit :
  "Art. 1231-1/9. L'adoptant ou les adoptants peuvent introduire une demande en prolongation du délai de leur aptitude à adopter par voie de requête unilatérale devant le tribunal de la famille qui a prononcé le jugement d'aptitude initial. La requête est déposée au greffe au plus tôt cinq mois avant l'expiration de la validité du jugement d'aptitude et au plus tard le dernier jour de la validité du jugement d'aptitude. La requête est signée soit par l'adoptant ou les adoptants, soit par leur avocat et elle précise que le ou les adoptants souhaitent poursuivre une procédure d'adoption.
  L'adoptant ou les adoptants transmettent une copie de la requête et une attestation de composition de ménage à l'autorité centrale communautaire compétente.".

  Art. 27. Dans la même sous-section 3, il est inséré un article 1231-1/10 rédigé comme suit :
  "Art. 1231-1/10. Pour que la requête soit recevable, y sont annexés les documents visés à l'article 1231-1/3, à l'exception de la copie certifiée conforme de l'acte de naissance ou de l'acte équivalent.
  En outre, y est annexé la convention signée entre l'adoptant ou les adoptants et un organisme agréé d'adoption ou l'accord de l'autorité centrale communautaire compétente donné sur le projet d'adoption.".

  Art. 28. Dans la même sous-section 3, il est inséré un article 1231-1/11 rédigé comme suit :
  "Art. 1231-1/11. § 1er. Dès réception de la requête, le greffe envoie sans délai une copie à l'autorité centrale communautaire compétente qui examine tous les éléments relevants.
  § 2. S'il résulte de cet examen que la situation du ou des adoptants n'a pas subi de changement susceptible de modifier l'aptitude constatée par le jugement d'aptitude initial, l'autorité centrale communautaire compétente transmet au greffe, endéans le mois, une attestation motivée afin d'en informer le tribunal de la famille.
  § 3. S'il résulte de cet examen que la situation du ou des adoptants a subi des changements susceptibles de modifier l'aptitude constatée par le jugement d'aptitude initial, l'autorité centrale communautaire compétente en informe le greffe endéans le mois et procède sans délai à une actualisation de l'enquête sociale.
  L'autorité centrale communautaire compétente transmet au greffe une actualisation du rapport de l'enquête sociale établi dans le cadre de la procédure en constatation de l'aptitude à adopter dans un délai de deux mois à compter de la réception de la communication écrite du greffe visée au paragraphe 1er.
  L'actualisation du rapport de l'enquête sociale est réalisée par les services compétents pour établir le rapport de l'enquête sociale initiale.
  L'actualisation comprend une évaluation de la situation actuelle de l'adoptant ou des adoptants et décrit les éventuels éléments susceptibles d'avoir une incidence sur l'aptitude à adopter.
  § 4. A défaut pour le greffe d'avoir été informé par l'autorité centrale communautaire compétente de la situation du ou des adoptants dans le délai d'un mois visé aux paragraphes 2 et 3, le ou les adoptants sont présumés être dans une situation identique à celle constatée par le jugement d'aptitude initial. Le greffe en informe le ministère public.
  Le ministère public procède à une actualisation de l'enquête de moralité réalisée en application de l'article 1231-1/5. Il rédige un avis écrit qui est déposé au dossier de la procédure huit jours avant l'audience.".

  Art. 29. Dans la même sous-section 3, il est inséré un article 1231-1/12 rédigé comme suit :
  "Art. 1231-1/12. Dans les cas visés à l'article 1231-1/11, § 3, l'adoptant ou les adoptants sont convoqués par pli judiciaire dans les trois jours du dépôt au greffe de l'actualisation du rapport de l'enquête sociale :
  1° pour prendre connaissance du rapport dans un délai de quinze jours;
  2° afin de comparaître en personne devant le tribunal de la famille dans les quinze jours qui suivent l'expiration du délai visé au 1°. ".

  Art. 30. Dans la même sous-section 3, il est inséré un article 1231-1/13 rédigé comme suit :
  "Art. 1231-1/13. Le tribunal de la famille se prononce sur la prolongation du délai d'aptitude de l'adoptant ou des adoptants à procéder à une adoption :
  1° dans les cas visés à l'article 1231-1/11, § 2, dans les quinze jours de la réception de l'attestation motivée de l'autorité centrale communautaire compétente, sans convocation des parties, sauf si le juge décide de les convoquer;
  2° dans les cas visés à l'article 1231-1/11, § 3, dans les quinze jours de l'audience;
  3° dans les cas visés à l'article 1231-1/11, § 4, dans les quinze jours qui suivent l'expiration du délai d'un mois.
  Le jugement, s'il échet, mentionne le nombre d'enfants que l'adoptant ou les adoptants seraient aptes à adopter, ainsi que les éventuelles restrictions à leur aptitude.
  Le jugement en prolongation du délai d'aptitude à adopter ne peut servir que pour une procédure en adoption d'un ou de plusieurs enfants.
  La validité du jugement expire deux ans après son prononcé. Toutefois, si au moment du dépôt de la requête, un enfant a été proposé et accepté, le tribunal peut prévoir que la validité du jugement de renouvellement de l'aptitude est maintenue jusqu'au prononcé de l'adoption.
  Le jugement en prolongation du délai d'aptitude à adopter produit ses effets au jour de l'expiration du précédent jugement d'aptitude.
  L'adoptant ou les adoptants peuvent introduire des demandes successives de prolongation du délai de leur aptitude à adopter, dans le cadre de la même procédure en adoption.".

  Art. 31. Dans la même sous-section 3, il est inséré un article 1231-1/14 rédigé comme suit :
  "Art. 1231-1/14. Dans les trois jours qui suivent la date à laquelle le jugement est devenu définitif, le greffier en adresse une copie à l'autorité centrale fédérale. Si le jugement prolonge le délai d'aptitude à adopter, le greffier lui adresse également une copie de l'avis écrit du ministère public visé à l'article 1231-1/11, § 4, alinéa 2. Le greffier en avise l'adoptant ou les adoptants.
  L'autorité centrale fédérale et l'autorité centrale communautaire compétente font application des articles 346-2/1 et 361-2 du Code civil.".

  Art. 32. A l'article 1231-3 du même Code, inséré par la loi du 24 avril 2003 et modifié par les lois des 27 décembre 2004 et 30 juillet 2013, remplacé par la loi du 8 mai 2014, les modifications suivantes sont apportées :
  1° l'alinéa 1er est complété par la phrase suivante :
  "Dans les cas où l'obtention d'un jugement déclarant les requérants qualifiés et aptes à assumer une adoption est requis en application de l'article 346-1/1 du Code civil, la requête est introduite avant l'expiration du délai de validité de ce jugement.".
  2° l'alinéa 2 est complété par le 3° rédigé comme suit :
  "3° dans les cas où l'obtention d'un jugement déclarant les requérants qualifiés et aptes à assumer une adoption est requis en application de l'article 346-1/1 du Code civil, une copie certifiée conforme de ce jugement et de la convention signée entre l'adoptant ou les adoptants et l'organisme agréé qui leur a confié l'enfant.".

  Art. 33. A l'article 1231-4, § 1er, du même Code, inséré par la loi du 24 avril 2003 et modifié par les lois du 6 décembre 2005 et du 14 janvier 2013, les modifications suivantes sont apportées :
  1° l'alinéa 1er est complété par les mots suivants :
  ", ainsi qu'un extrait d'acte de mariage ou un extrait de déclaration de cohabitation légale ou encore la preuve d'une cohabitation de plus de trois ans";
  2° l'alinéa 2 est complété par la phrase suivante :
  "Le greffier adresse par ailleurs une copie de la requête à l'autorité centrale fédérale qui en informe les autorités centrales communautaires.".

  Art. 34. Dans l'article 1231-5 du même Code, inséré par la loi du 24 avril 2003 et modifié par les lois des 27 décembre 2004, 17 mars 2013 et 12 mai 2014, les mots "procède à une enquête de moralité sur la personne de l'adoptant ou des adoptants, notamment par la consultation de leur casier judiciaire, ou dans les cas où telle enquête a déjà été réalisée en application de l'article 1231-1/5, à l'actualisation de cette enquête, et" sont insérés entre les mots "qui" et "recueille".

  Art. 35. Dans l'article 1231-6 du même Code, inséré par la loi du 24 avril 2003 et modifié par les lois du 27 décembre 2004 et du 30 juillet 2013, l'alinéa 1er est remplacé par ce qui suit :
  "Dans les cas visés à l'article 346-1/1, alinéa 2, du Code civil, le tribunal de la famille ordonne une enquête sociale afin de s'éclairer sur l'aptitude à adopter de l'adoptant ou des adoptants et sur l'intérêt de l'enfant visé par la procédure à être adopté. Au cours de cette enquête, les services désignés par les communautés compétentes sont consultés. Toutefois lorsqu'il s'agit d'un enfant visé à l'article 346-1/1, alinéa 2, 1°, du Code civil, le juge peut décider de ne pas ordonner cette enquête sociale.".

  Art. 36. Dans l'article 1231-7, alinéa 2, du même Code, inséré par la loi du 24 avril 2003 et modifié par la loi du 27 décembre 2004, le mot "deux" est remplacé par le mot "quatre".

  Art. 37. Dans l'article 1231-8, alinéa 1er, du même Code, inséré par la loi du 24 avril 2003 et modifié par la loi du 27 décembre 2004, les mots "des rapports du ministère public et de l'enquête sociale" sont remplacés par les mots "de l'avis du ministère public et des renseignements recueillis en vertu de l'article 1231-5, et, le cas échéant, du rapport de l'enquête sociale".

  Art. 38. Dans l'article 1231-9 du même Code, inséré par la loi du 24 avril 2003 et modifié par la loi du 30 juillet 2013, les mots "des deux rapports" sont remplacés par les mots "de l'avis du ministère public et, le cas échéant, du rapport de l'enquête sociale".

  Art. 39. Dans la quatrième partie, livre IV, chapitre VIIIbis, section 2, sous-section première du même Code, il est inséré un article 1231-18/1 rédigé comme suit :
  "Art. 1231-18/1. Lorsque le jugement a acquis force de chose jugée, le greffe en adresse, sans délai, une copie à l'autorité centrale fédérale.
  L'autorité centrale fédérale adresse, sans délai, à l'autorité centrale communautaire compétente le jugement qui lui est transmis en copie par le greffier.".

  Art. 40. Dans la quatrième partie, livre IV, chapitre VIIIbis, section 3, du même Code, la sous-section 1re comprenant les articles 1231-27 à 1231-33 et la sous-section 1rebis comprenant les articles 1231-33/1 à 1231-33/7 sont abrogées.

  Art. 41. Dans l'article 1231-41, 1°, du même Code, inséré par la loi du 24 avril 2003 et modifié par la loi du 30 décembre 2009, les mots "aux articles 1231-31 et 1231-33/5" sont remplacés par les mots "aux articles 1231-1/7 et 1231-1/13".

  Art. 42. Dans l'article 1231-42, 3°, du même Code, inséré par la loi du 24 avril 2003, les mots "articles 1231-32 du présent Code" sont remplacés par les mots "articles 361-2/1".

  Art. 43. Dans l'article 1231-53 du même Code, inséré par la loi du 24 avril 2003, les mots "sections 2, 3 et 4" sont remplacés par les mots "sections 1bis, 2, 3 et 4".

  Art. 44. Dans la quatrième partie, livre IV, chapitre VIIIbis, section 5, du même Code, il est inséré un article 1231-57 rédigé comme suit :
  "Art. 1231-57. Les articles 1231-1/8, 1231-1/14 et 1231-18/1 sont applicables au greffe de la cour d'appel.".

  CHAPITRE 3. - Dispositions finales

  Section 1re. - Dispositions transitoires

  Art. 45. Les chapitres 1 et 2 du présent titre s'appliquent à toute personne désireuse d'adopter un enfant et qui n'a pas signé de convention de médiation avec le service agréé pour l'adoption nationale de la Communauté flamande, ou dont la demande de recevabilité de la candidature n'a pas été acceptée par un organisme d'adoption agréé pour l'adoption interne en Communauté française, le jour de l'entrée en vigueur du présent titre.

  Art. 46. Lorsque le jugement d'aptitude initial a été prononcé par un tribunal de la jeunesse, la demande en prolongation du délai de l'aptitude à adopter visée à l'article 1231-1/9 du Code judicaire doit être introduite devant le tribunal de la famille situé dans le ressort du tribunal de la jeunesse qui a prononcé ce jugement d'aptitude initial.

  Section 2. - Entrée en vigueur

  Art. 47. Le Roi fixe la date d'entrée en vigueur du présent titre et au plus tard le 1er janvier 2020, à l'exception des articles 11, 13, 33 et 39, qui entrent en vigueur le dixième jour qui suit la publication de la présente loi au Moniteur belge.

  TITRE 3. - Modification de l'article 2277 du Code civil concernant la prescription des créances pour la fourniture de biens et de services via des réseaux de distribution d'eau, de gaz ou d'électricité ou la fourniture de services de communications électroniques ou de services de radiotransmission ou de radio- et télédiffusion via des réseaux de communications électroniques

  Art. 48. L'article 2277 du Code civil est complété par un alinéa 2, rédigé comme suit :
  "Les créances pour la fourniture de biens et de services via des réseaux de distribution d'eau, de gaz ou d'électricité ou la fourniture de services de communications électroniques ou de services de radiotransmission ou de radio- et télédiffusion via des réseaux de communications électroniques se prescrivent par cinq ans.".

  TITRE 4. - Modifications de la loi du 16 juillet 2004 portant le Code de droit international privé

  CHAPITRE 1er. - Nom et prénoms

  Art. 49. L'article 37 de la loi du 16 juillet 2004 portant le Code de droit international privé, dont le texte actuel formera le paragraphe 1er, est complété par un paragraphe 2 rédigé comme suit :
  " § 2. Lorsque la personne possède deux ou plusieurs nationalités, il est tenu compte de la nationalité choisie par elle parmi celles-ci.
  Le choix est formulé de manière expresse, dans un écrit daté et signé, au moment où la détermination du nom ou des prénoms de la personne est soumise pour la première fois à l'autorité belge.
  En cas de désaccord ou en cas d'absence de choix, l'article 3 est applicable.".

  Art. 50. L'article 39 de la même loi est remplacé par ce qui suit :
  "Détermination ou changement de nom ou de prénoms intervenus à l'étranger

  Art. 39. § 1er. Une décision judiciaire ou administrative étrangère ou un acte dressé par une autorité étrangère, concernant la détermination ou le changement de nom ou de prénoms d'une personne, est reconnu si, outre le respect des conditions visées à l'article 25 dans le cas d'une décision judiciaire et aux articles 18 et 21 dans les autres cas :
  1° la détermination ou le changement de nom ou de prénoms est conforme au droit, choisi par cette personne, d'un Etat dont elle a la nationalité au moment de la décision ou de l'acte; ou
  2° dans le cas où la décision a été rendue ou l'acte a été dressé dans l'Etat sur le territoire duquel la personne a sa résidence habituelle, la décision ou l'acte est conforme au droit, choisi par cette personne, d'un Etat dont elle a la nationalité ou sur le territoire duquel elle réside au moment de la décision ou de l'acte.
  La personne peut effectuer un choix de la loi applicable visé à l'alinéa 1er devant l'autorité belge au moment de l'inscription dans un registre de la population, un registre consulaire de la population, un registre des étrangers ou un registre d'attente d'une décision ou d'un acte étrangers relatifs au nom et prénoms ou au moment de leur transcription dans un registre de l'état civil. La déclaration doit intervenir au plus tard dans les cinq ans qui suivent le prononcé de la décision étrangère ou la rédaction de l'acte relatifs à la détermination ou au changement de nom ou des prénoms. Cette déclaration n'est possible que si le droit de l'Etat dans lequel la décision a été rendue ou l'acte a été dressé ne prévoit pas cette possibilité de choix.
  Au sens de ce paragraphe, le droit d'un Etat s'entend des règles de droit, y compris les règles de droit international privé.
  § 2. Le recours visé à l'article 27, § 1er, alinéa 4, est également applicable en cas de refus de reconnaissance d'une décision administrative étrangère.".

  CHAPITRE 2. - Adaptation du Code de droit international privé à différents règlements européens

  Section 1re. - Règlement (UE) n° 1259/2010 du Conseil du 20 décembre 2010 mettant en oeuvre une coopération renforcée dans le domaine de la loi applicable au divorce et à la séparation de corps

  Art. 51. Dans l'article 55, § 2, de la même loi, l'alinéa 3 est remplacé par ce qui suit :
  "Ce choix peut être exprimé au plus tard lors de la première comparution devant le tribunal saisi de la demande en divorce ou en séparation de corps.".

  Section 2. - Règlement (CE) n° 4/2009 du Conseil du 18 décembre 2008 relatif à la compétence, la loi applicable, la reconnaissance et l'exécution des décisions et la coopération en matière d'obligations alimentaires et protocole de La Haye du 23 novembre 2007 sur la loi applicable aux obligations alimentaires

  Art. 52. L'article 73 de la même loi est remplacé par ce qui suit :
  "Compétence internationale en matière d'obligations alimentaires

  Art. 73. § 1er. La compétence des juridictions belges pour connaître de toute demande concernant une obligation alimentaire découlant des relations de famille, de filiation ou d'alliance, y compris les obligations alimentaires envers les enfants indépendamment de la situation matrimoniale de leurs parents, est déterminée par le règlement (CE) n° 4/2009 du Conseil du 18 décembre 2008 relatif à la compétence, la loi applicable, la reconnaissance et l'exécution des décisions et la coopération en matière d'obligations alimentaires.
  § 2. Les juridictions belges sont compétentes pour connaître de toute demande concernant une obligation alimentaire non visée au paragraphe 1er, outre dans les cas prévus aux dispositions générales de la présente loi, si :
  1° le créancier d'aliments a sa résidence habituelle en Belgique lors de l'introduction de la demande; ou
  2° le créancier et le débiteur d'aliments sont belges lors de l'introduction de la demande.".

  Art. 53. L'article 74 de la même loi est remplacé par ce qui suit :
  "Droit applicable à l'obligation alimentaire

  Art. 74. Le droit applicable à l'obligation alimentaire découlant des relations de famille, de filiation ou d'alliance, y compris les obligations alimentaires envers les enfants indépendamment de la situation matrimoniale de leurs parents est déterminé par l'article 15 du règlement (CE) n° 4/2009 du Conseil du 18 décembre 2008 relatif à la compétence, la loi applicable, la reconnaissance et l'exécution des décisions et la coopération en matière d'obligations alimentaires, qui renvoie au protocole de La Haye du 23 novembre 2007 sur la loi applicable aux obligations alimentaires auquel il se réfère.".

  Art. 54. L'article 75 de la même loi est remplacé par ce qui suit :
  "Droit applicable à l'obligation alimentaire ne découlant pas de relations de famille

  Art. 75. § 1er. L'obligation alimentaire non visée à l'article 74 est régie par le droit de l'Etat sur le territoire duquel le créancier a sa résidence habituelle.
  En cas de changement de la résidence habituelle du créancier, la loi de l'Etat de la nouvelle résidence habituelle s'applique à partir du moment où le changement est survenu.
  § 2. Par dérogation au paragraphe 1er, l'obligation alimentaire est régie par le droit de l'Etat dont le créancier et le débiteur ont la nationalité si le débiteur a sa résidence habituelle sur le territoire de cet Etat.".

  Section 3. - Règlement (UE) n° 650/2012 du Parlement européen et du Conseil du 4 juillet 2012 relatif à la compétence, la loi applicable, la reconnaissance et l'exécution des décisions et l'acceptation et l'exécution des actes authentiques en matière de successions et à la création d'un certificat successoral européen

  Art. 55. L'article 77 de la même loi est remplacé par ce qui suit :
  "Compétence internationale en matière de succession

  Art. 77. § 1er. La compétence des juridictions belges pour connaître de toute demande en matière successorale est déterminée par le règlement (UE) n° 650/2012 du Parlement européen et du Conseil du 4 juillet 2012 relatif à la compétence, la loi applicable, la reconnaissance et l'exécution des décisions et l'acceptation et l'exécution des actes authentiques en matière de successions et à la création d'un certificat successoral européen.
  § 2. Par dérogation aux dispositions générales de la présente loi, toute demande en matière successorale que ce règlement exclut de son domaine d'application est régie par les règles de compétence prévues aux articles 4 à 19 du règlement visé au paragraphe 1er.".

  Art. 56. L'article 78 de la même loi est remplacé par ce qui suit :
  "Droit applicable à la succession

  Art. 78. § 1er. Le droit applicable en matière successorale est déterminé par le règlement (UE) n° 650/2012 du Parlement européen et du Conseil du 4 juillet 2012 relatif à la compétence, la loi applicable, la reconnaissance et l'exécution des décisions et l'acceptation et l'exécution des actes authentiques en matière de successions et à la création d'un certificat successoral européen.
  § 2. Toute matière successorale que ce règlement exclut de son domaine d'application est régie par le droit applicable en vertu de ses articles 20 à 38.
  § 3. L'application des dispositions de la Convention sur les conflits de lois en matière de forme des dispositions testamentaires, conclue à La Haye le 5 octobre 1961, est étendue aux dispositions à cause de mort qui ne sont couvertes ni par le règlement ni par la Convention.".

  Art. 57. Les articles 79 à 84 de la même loi sont abrogés.

  Section 4. - Règlement (CE) n° 593/2008 du Parlement européen et du Conseil du 17 juin 2008 sur la loi applicable aux obligations contractuelles (Rome I)

  Art. 58. A l'article 98 de la même loi, le paragraphe 1er est remplacé par ce qui suit :
  " § 1er. Le droit applicable aux obligations contractuelles est déterminé par le règlement (CE) n° 593/2008 du Parlement européen et du Conseil du 17 juin 2008 sur la loi applicable aux obligations contractuelles (Rome I).
  Hormis les cas où la loi en dispose autrement, les obligations contractuelles que le règlement visé à l'alinéa 1er exclut de son champ d'application sont régies par le droit applicable en vertu du règlement.".

  Section 5. - Dispositions transitoires du Code de droit international privé

  Art. 59. L'article 126, § 1er, de la même loi est complété par un alinéa rédigé comme suit :
  "L'article 77 tel qu'il était rédigé avant son remplacement par la loi du 6 juillet 2017 reste applicable aux successions ouvertes avant le 17 août 2015 et, lorsqu'il s'agit des demandes en matière successorale visées à l'article 77, § 2, aux successions ouvertes avant le dixième jour qui suit celui de la publication de la même loi au Moniteur belge.".

  Art. 60. A l'article 127 de la même loi sont apportées les modifications suivantes :
  1° il est inséré un paragraphe 6/1 rédigé comme suit :
  " § 6/1. L'article 78 tel qu'il était rédigé avant son remplacement par la loi du 6 juillet 2017 et les articles 79 à 84 tels qu'ils étaient rédigés avant leur abrogation par la loi du 6 juillet 2017 restent applicables aux successions ouvertes avant le 17 août 2015 et lorsqu'il s'agit des matières successorales visées à l'article 78, § 2,aux successions ouvertes avant le dixième jour qui suit celui de la publication de la même loi au Moniteur belge.";
  2° il est inséré un paragraphe 7/1 rédigé comme suit :
  " § 7/1. L'article 98, § 1er, tel qu'il était rédigé avant son remplacement par la loi du 6 juillet 2017 reste applicable aux obligations contractuelles visées à l'article 98, § 1er, alinéa 2, conclues avant le dixième jour qui suit celui de la publication de la même loi au Moniteur belge.".

  CHAPITRE 3. - Disposition transitoire

  Art. 61. Les articles 52 à 54 s'appliquent dans le cas où des procédures sont engagées, des transactions judiciaires sont approuvées ou conclues et des actes authentiques sont établis, à partir du 18 juin 2011, y compris aux aliments réclamés pour une période antérieure à cette date. Toutefois, les articles 73, § 2, et 75 de la loi du 16 juillet 2004 portant le Code de droit international privé, tels que remplacés respectivement par les articles 52 et 54, sont applicables aux procédures qui sont engagées, aux transactions judiciaires qui sont approuvées ou conclues et aux actes authentiques qui sont établis à compter du dixième jour qui suit celui de la publication de la présente loi au Moniteur belge.
  Les articles 55 et 56 sont applicables aux successions ouvertes à partir du 17 août 2015. Toutefois, les articles 77, § 2, et 78, § 2, de la loi du 16 juillet 2004 portant le Code de droit international privé, tels que remplacés respectivement par les articles 55 et 56 de la présente loi, sont applicables aux successions ouvertes à compter du dixième jour qui suit celui de la publication de la présente loi au Moniteur belge.
  L'article 58 est applicable aux contrats conclus à compter du 17 décembre 2009. Toutefois, l'alinéa 2 de l'article 98, § 1er, de la loi du 16 juillet 2004 portant le Code de droit international privé, tel que remplacé par l'article 58 de la présente loi, est applicable aux contrats conclus à compter du dixième jour qui suit celui de la publication de la présente loi au Moniteur belge.

  CHAPITRE 4. - Entrée en vigueur

  Art. 62. Les articles 49 et 50 entrent en vigueur à la date fixée par le Roi, et, au plus tard, le premier jour du sixième mois qui suit celui au cours duquel la présente loi aura été publiée au Moniteur belge.
  L'article 51 produit ses effets le 21 juin 2012.
  Les articles 57, 59 et 60, 1°, produisent leurs effets le 17 août 2015.
  L'article 60, 2°, produit ses effets le 17 décembre 2009.

  TITRE 5. - Modifications diverses en matière de droit de la famille et relatives au tribunal de la famille

  CHAPITRE 1er. - Modifications du Code civil

  Art. 63. L'article 301 du Code civil, remplacé par la loi du 27 avril 2007 et modifié en dernier lieu par la loi du 30 juillet 2013, est modifié comme suit :
  1° le paragraphe 1er est remplacé par ce qui suit :
  " § 1er. Les époux peuvent convenir à tout moment de la pension alimentaire éventuelle, du montant de celle-ci et des modalités selon lesquelles le montant convenu pourrait être revu.";
  2° dans le paragraphe 9, alinéa 2, les mots ", aux conditions fixées par l'article 1257 du Code judiciaire" sont abrogés.

  Art. 64. Dans l'article 331sexies du même Code, remplacé par la loi du 1er juillet 2006 et modifié par les lois des 17 mars 2013 et 25 avril 2014, les mots "par le président du tribunal" sont remplacés par les mots ", selon le cas, par le tribunal de la famille ou le juge de paix".

  Art. 65. Dans le livre Ier, titre VII, chapitre V, du même Code, il est inséré un article 335quater rédigé comme suit :
  "Art. 335quater. Par dérogation aux articles 335, §§ 1er et 3, et 335ter, §§ 1er et 2, le père et la mère ou la mère et la coparente, selon le cas, peuvent choisir le nom de l'enfant au moment de la déclaration de choix de la loi applicable visée à l'article 39, § 1er, alinéa 2, du Code de droit international privé. L'officier de l'état civil prend acte de ce choix.
  Mention de la déclaration est faite en marge de l'acte de naissance transcrit ou inscrit dans les registres de l'état civil et de tous les actes dressés ou reconnus qui les concernent.".

  Art. 66. Dans le livre Ier, titre VIII, chapitre Ier, section 2, § 1er, E, du même Code, il est inséré un article 348-5/1 rédigé comme suit :
  "Art. 348-5/1. Par dérogation aux articles 348-3 et 348-5, le consentement est donné, en cas d'adoption visée à l'article 361-5, par un tuteur ad hoc désigné par le tribunal à la requête de toute personne intéressée ou du procureur du Roi.".

  Art. 67. A l'article 353-2, § 1er, du même Code, inséré par la loi du 24 avril 2003 et remplacé par la loi du 8 mai 2014, un alinéa rédigé comme suit est inséré entre les alinéas 1er et 2 :
  "Les parties peuvent toutefois solliciter du tribunal que l'adopté conserve un de ses noms précédé ou suivi d'un nom de l'adoptant ou de l'époux, du cohabitant ou de l'ancien partenaire. La composition du nom de l'adopté est limitée à un nom pour l'adopté et à un nom pour l'époux, le cohabitant ou l'ancien partenaire.".

  Art. 68. L'article 353-4bis du même Code, inséré par la loi du 18 mai 2006 et modifié par la loi du 8 mai 2014, est remplacé par ce qui suit :
  "Art. 353-4bis. Le nom choisi par l'adoptant ou les adoptants s'impose aux enfants adoptés ultérieurement par eux.
  L'alinéa 1er n'est toutefois pas applicable lorsque les adoptants attribuent un nom à l'enfant adopté conformément aux articles 353-1, alinéa 3, 353-2, § 1er, alinéas 2 à 4, et 353-3.".

  Art. 69. Dans l'article 353-5, alinéa 1er, du même Code, inséré par la loi du 24 avril 2003 et modifié par la loi du 8 mai 2014, les mots "353-2, § 1er, alinéas 2 et 3" sont remplacés par les mots "353-2, § 1er, alinéas 2 à 4".

  Art. 70. Dans l'article 410, § 1er, du même Code, remplacé par la loi du 29 avril 2001, le 5° est remplacé par ce qui suit :
  "5° renoncer à une succession ou à un legs universel ou à titre universel ou l'accepter, ce qui ne pourra se faire que sous bénéfice d'inventaire; le juge de paix peut, par une ordonnance motivée, octroyer l'autorisation d'accepter une succession, un legs universel ou à titre universel purement et simplement, compte tenu de la nature et de la consistance du patrimoine hérité et pour autant que les bénéfices soient manifestement supérieurs aux charges du patrimoine hérité;".

  CHAPITRE 2. - Modifications du Code judiciaire

  Section 1re. - Dispositions modificatives

  Art. 71. L'article 569, alinéa 1er, 22°, et alinéa 3, du Code judiciaire, sont abrogés.

  Art. 72. L'article 570 du même Code, remplacé par la loi du 16 juillet 2004, est remplacé par ce qui suit :
  "Art. 570. § 1er. Le tribunal de première instance statue, quelle que soit la valeur du litige, sur les demandes visées aux articles 23, § 1er, alinéa 1er, et 27, § 1er, alinéa 4, 1re phrase, et § 2, 1re phrase, du Code de droit international privé.
  Le tribunal de la famille statue sur les demandes visées à l'article 31, § 1er, alinéa 3, du Code de droit international privé. Le tribunal de la famille statue également sur les demandes visées aux articles 23, § 1er, alinéa 2, et 27, § 1er, alinéa 4, 2e phrase, et § 2, 2e phrase, du même Code.
  § 2. Par dérogation au paragraphe 1er, alinéa 1er, le tribunal de commerce statue sur les demandes visées à l'article 121 du Code de droit international privé.".

  Art. 73. A l'article 572bis du même Code, inséré par la loi du 30 juillet 2013, modifiée par la loi du 8 mai 2014, les modifications suivantes sont apportées :
  a) le 1° est remplacé par ce qui suit :
  "1° des demandes relatives à l'état des personnes, en ce compris des demandes relatives à la nationalité belge et à la reconnaissance du statut d'apatride;";
  b) au 7°, les mots ", à l'exception de celles qui sont liées au droit au revenu d'intégration sociale" sont abrogés.

  Art. 74. L'article 591, 14°, du même Code, remplacé par la loi du 30 juillet 2013, est remplacé par ce qui suit :
  "14° des demandes relatives au remboursement du revenu d'intégration social visé à l'article 26 de la loi du 26 mai 2002 concernant le droit à l'intégration sociale et des demandes relatives au remboursement des frais d'aide sociale visé à l'article 98, § 2, de la loi du 8 juillet 1976 organique des centres publics d'action sociale;".

  Art. 75. L'article 626 du même Code, remplacé par la loi du 8 mai 2014, est abrogé.

  Art. 76. L'article 628 du même Code, modifié en dernier lieu par la loi du 25 avril 2014, est complété par un alinéa 2, rédigé comme suit :
  "Les tribunaux de la famille de Bruxelles sont seuls compétents dans les cas prévus à l'alinéa 1er, 9°, lorsque le demandeur n'a pas ou n'a plus sa résidence habituelle en Belgique.".

  Art. 77. A l'article 629bis du même Code, inséré par la loi du 30 juillet 2013, modifiée par la loi du 8 mai 2014, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans le paragraphe 1er, les mots "et les demandes relatives aux relations personnelles visées à l'article 375bis du Code civil" sont insérés entre les mots "ou aux biens de ces enfants" et les mots "ou relatives à un enfant dont";
  2° il est inséré un paragraphe 2/1, rédigé comme suit :
  " § 2/1. Les actions relatives à la filiation sont portées devant le tribunal de la famille du domicile ou à défaut, de la résidence habituelle de l'enfant.
  En l'absence de domicile ou de résidence habituelle de l'enfant, le tribunal de la famille de Bruxelles est compétent pour connaître de la demande.
  La notion de "résidence habituelle" s'entend au sens de l'article 4, § 2, du Code de droit international privé.";
  3° le paragraphe 7, alinéa 2, est remplacé par ce qui suit :
  "Le tribunal de la famille peut décider de renvoyer l'affaire au tribunal de la famille d'un autre arrondissement si un dossier jeunesse y a été constitué ou si la bonne administration commande pareil renvoi. Le renvoi vers un autre arrondissement où un dossier jeunesse a été constitué se fait à la demande d'une partie ou du ministère public.".

  Art. 78. Dans la troisième partie, titre III, du même Code, il est inséré un article 632bis rédigé comme suit :
  "Art. 632bis. Les procédures de reconnaissance du statut d'apatride sont de la compétence du tribunal de la famille qui est établi au siège de la Cour d'appel dans le ressort duquel le demandeur a son domicile ou sa résidence ou, à défaut, le demandeur est présent. Toutefois, lorsque la procédure est en langue allemande, le tribunal de la famille d'Eupen est seul compétent.".

  Art. 79. Dans l'article 731, alinéa 2, du Code judiciaire, inséré par la loi du 30 juillet 2013, au texte néerlandais, les mots "dan wel aan de familiekamers" sont remplacés par les mots "dan wel van de familiekamers".

  Art. 80. Dans l'article 1253ter/3, § 2, du même code, inséré par la loi du 30 juillet 2013, modifiée par la loi du 8 mai 2014, les mots "le délai de trois mois fixé" sont remplacés par les mots "le délai fixé".

  Art. 81. Dans l'article 1253ter/4, § 2, du même Code, inséré par la loi du 30 juillet 2013, modifiée par la loi du 8 mai 2014, l'alinéa 2 est remplacé par ce qui suit :
  "Les causes sont introduites et instruites comme en référé.".

  Art. 82. Dans la phrase liminaire de l'article 1253ter/5, du même Code, inséré par la loi du 30 juillet 2013 et elle-même modifiée par la loi du 8 mai 2014, les mots "articles 19, alinéa 2" sont remplacés par les mots "articles 19, alinéa 3" et les mots ", à titre provisoire, les mesures" sont remplacés par les mots "les mesures provisoires".

  Art. 83. Dans l'article 1253ter/6, alinéa 4, du même Code, inséré par la loi du 30 juillet 2013, les mots "et qui ne peut dépasser septante-cinq jours" sont remplacés par les mots "et qui ne peut dépasser trois mois ou, si le délai court totalement ou partiellement pendant les vacances judiciaires, quatre mois".

  Art. 84. L'article 1294bis du même Code, inséré par la loi du 27 avril 2007, abrogé par la loi du 8 mai 2014, est rétabli comme suit :
  "Art. 1294bis. Si la procédure est abandonnée, les conventions prévues à l'article 1288 lient les parties à titre provisoire, jusqu'à ce qu'il soit fait application de l'article 1280. Si les conventions ne revêtent pas la forme d'un titre exécutoire, la cause est, à la demande de la partie la plus diligente, fixée à la première audience utile réputée urgente visée à l'article 1256, alinéa 3. Si l'une des parties en fait la demande, le tribunal de la famille prononce une mesure provisoire, conforme aux conventions.".

  Art. 85. L'article 1296 du même Code, modifié par la loi du 2 juin 2010, est remplacé par ce qui suit :
  "Art. 1296. Le greffier communique le procès-verbal et les pièces au procureur du Roi afin que celui-ci puisse donner ses conclusions par écrit.".

  Art. 86. Dans l'article 1390bis du même Code, inséré par la loi du 31 mars 1987, remplacé par la loi du 29 mai 2000 et modifié par la loi du 14 janvier 2013, les modifications suivantes sont apportées :
  1° à l'alinéa 1er, les mots "203ter, 220, § 3, 221, 301bis du Code civil ou 1280, alinéa 6" sont remplacés par les mots "203ter, 220, § 3, 221, 301, § 11, du Code civil ou 1253ter/5, alinéa 1er, 6° ";
  2° à l'alinéa 3, les mots "203ter, 220, § 3, 221, 301bis du Code civil ou 1280, alinéa 6" sont remplacés par les mots "203ter, 220, § 3, 221, 301, § 11, du Code civil ou 1253ter/5, alinéa 1er, 6° ".

  Section 2. - Disposition transitoire

  Art. 87. L'article 84 s'applique à toutes les conventions visées à l'article 1288 du Code judiciaire qui sont signées après l'entrée en vigueur de la présente loi.

  CHAPITRE 3. - Modifications de la loi du 16 juillet 2004 portant le Code de droit international privé

  Art. 88. L'article 23, § 1er, de la loi du 16 juillet 2004 portant le Code de droit international privé est complété par un alinéa rédigé comme suit :
  "Le tribunal de la famille est compétent pour connaître d'une demande concernant la reconnaissance ou la déclaration de la force exécutoire d'une décision judiciaire étrangère lorsqu'elle concerne une matière visée à l'article 572bis du Code judiciaire.".

  Art. 89. Dans l'article 68, alinéa 2, de la même loi, les mots "le consentement de l'adopté" sont remplacés par les mots "le consentement visé à l'alinéa 1er".

  CHAPITRE 4. - Modifications du Code consulaire

  Art. 90. Dans l'article 7, 4°, du Code consulaire, modifié par la loi du 18 décembre 2014, les mots "aux articles 335 et 335ter" sont remplacés par les mots "aux articles 335, 335ter et 335quater".

  Art. 91. A l'article 15 du même Code, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans l'alinéa 3, les mots "L'intéressé doit déposer une requête auprès du tribunal de première instance de Bruxelles" sont remplacés par les mots "Selon le cas, l'intéressé doit déposer une requête auprès du tribunal de la famille francophone de Bruxelles ou du tribunal de la famille néerlandophone de Bruxelles;";
  2° dans l'alinéa 5, les mots "première instance" sont remplacés par les mots "la famille".

  Art. 92. A l'article 16 du même Code, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans l'alinéa 1er, les mots "Le tribunal de première instance à Bruxelles" sont remplacés par les mots "Le tribunal de la famille francophone de Bruxelles ou le tribunal de la famille néerlandophone de Bruxelles, selon le cas,";
  2° dans l'alinéa 2, les mots "première instance" sont remplacés par les mots "la famille".

  Art. 93. Dans l'article 71, alinéa 2, du même Code, les mots "première instance" sont remplacés par les mots "la famille".

  CHAPITRE 5. - Modification du Code de la nationalité belge

  Art. 94. A l'article 15 du Code de la nationalité belge, remplacé par la loi du 4 décembre 2012 et modifié par la loi du 25 avril 2014, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans le paragraphe 5, alinéas 1er et 2, les mots "première instance" sont chaque fois remplacés par les mots "la famille";
  2° dans le paragraphe 5, alinéa 3, les mots "la chambre de la famille de" sont insérés entre les mots "requête adressée à" et les mots "la cour d'appel";
  3° dans le paragraphe 6, alinéa 2, les mots "première instance" sont remplacés par les mots "la famille";
  4° dans le paragraphe 6, alinéa 3, les mots "la chambre de la famille de" sont insérés entre les mots "requête adressée à" et "la cour d'appel".

  TITRE 6. - Legs

  CHAPITRE 1er. - Modification du Code civil

  Art. 95. L'article 910, alinéa 1er, du Code civil, modifié par les lois des 15 décembre 1949 et 5 août 1992, est complété par la phrase suivante :
  "L'autorisation n'est néanmoins pas requise pour les legs aux associations sans but lucratif, associations internationales sans but lucratif et fondations, régies par la loi du 27 juin 1921 sur les associations sans but lucratif, les fondations, les partis politiques européens et les fondations politiques européennes, aux congrégations ou maisons hospitalières de femmes, régies par le décret impérial du 18 février 1809 relatif aux congrégations ou maisons hospitalières de femmes, et aux séminaires, régis par le décret impérial du 6 novembre 1813 sur la conservation et administration des biens que possède le clergé dans plusieurs parties de l'Empire.".

  CHAPITRE 2. - Modification du décret impérial du 18 février 1809 relatif aux congrégations ou maisons hospitalières de femmes

  Art. 96. L'article 13 du décret impérial du 18 février 1809 relatif aux congrégations ou maisons hospitalières de femmes, est remplacé par ce qui suit :
  "Art. 13. Dans tous les cas, les actes de donations doivent être remis à l'Evêque du lieu du domicile du donateur. L'Evêque devra transmettre les actes de donation, avec son avis, au ministre ayant les cultes dans ses attributions afin que l'autorisation pour l'acceptation soit donnée.".

  CHAPITRE 3. - Modification du décret impérial du 6 novembre 1813 sur la conservation et administration des biens que possède le clergé dans plusieurs parties de l'Empire

  Art. 97. L'article 67 du décret impérial du 6 novembre 1813 sur la conservation et administration des biens que possède le clergé dans plusieurs parties de l'empire est remplacé comme suit :
  "Art. 67. Tout notaire devant lequel il aura été passé un acte contenant donation entre vifs au profit d'un séminaire ou d'une école secondaire ecclésiastique, sera tenu d'en instruire l'évêque, qui devra envoyer les pièces, avec son avis, au ministre ayant les cultes dans ses attributions afin que, s'il y a lieu, l'autorisation pour l'acceptation soit donnée en la forme accoutumée.
  Ces dons ne seront assujettis qu'au droit fixe d'un franc.".

  CHAPITRE 4. - Modifications de la loi du 27 juin 1921 sur les associations sans but lucratif, les fondations, les partis politiques européens et les fondations politiques européennes

  Art. 98. A l'article 16, alinéa 1er, de la loi du 27 juin 1921 sur les associations sans but lucratif, les fondations, les partis politiques européens et les fondations politiques européennes, remplacé par la loi du 27 décembre 2004, les mots "ou testamentaire" sont abrogés.

  Art. 99. A l'article 33, alinéa 1er, de la même loi, remplacé par la loi du 27 décembre 2004, les mots "ou testamentaire" sont abrogés.

  Art. 100. A l'article 54, alinéa 1er, de la même loi, remplacé par la loi programme du 27 décembre 2004, les mots "ou testamentaire" sont abrogés.

  CHAPITRE 5. - Disposition transitoire

  Art. 101. Les demandes d'autorisation introduites avant l'entrée en vigueur du présent titre, sur base des articles modifiés par les articles 95 à 100, restent soumises à la procédure qui était en vigueur au moment de leur introduction.

  TITRE 7. - Demandes concernant les mesures transfrontières relatives à la responsabilité parentale et la protection des enfants

  Art. 102. L'article 633septies, alinéa 1er, du Code judiciaire, inséré par la loi du 10 mai 2007 et modifié par la loi du 30 juillet 2013, est remplacé par ce qui suit :
  "Sans préjudice de l'article 1322decies, § 4, alinéas 2 à 6, le tribunal de la famille qui est établi au siège de la cour d'appel dans le ressort de laquelle l'enfant avait sa résidence habituelle avant son déplacement ou son non-retour illicite, est seul compétent pour connaître des demandes visées à l'article 1322decies.".

  Art. 103. L'article 1322sexies du même Code, inséré par la loi du 10 août 1998 et modifié par les lois des 10 mai 2007 et 30 juillet 2013, est modifié comme suit :
  1° l'alinéa 1er est remplacé comme suit :
  "Les causes visées à l'article 1322bis sont introduites et instruites comme en référé.";
  2° les alinéas 2, 3 et 4 sont abrogés.

  Art. 104. L'article 1322nonies, § 1er, du même Code, inséré par la loi du 10 mai 2007 et modifié par la loi du 27 novembre 2013, est complété par un alinéa 2 rédigé comme suit :
  "Aucun recours ne peut être exercé à l'encontre de la décision visée à l'alinéa 1er.".

  Art. 105. A l'article 1322decies du même Code inséré par la loi du 10 mai 2007 et modifié par la loi du 30 juillet 2013, les modifications suivantes sont apportées :
  1° le paragraphe 4 est complété par cinq alinéas rédigés comme suit :
  "Dans le cadre de ses conclusions, chacune des parties peut demander au tribunal de renvoyer le litige à une juridiction précédemment saisie d'un litige en matière de responsabilité parentale ou d'un litige connexe afin que les deux demandes soient jointes pour cause de connexité.
  Le tribunal de la famille saisi par au moins l'une des parties peut joindre les demandes d'office.
  Dans chacun des cas, le tribunal prend sa décision dans l'intérêt supérieur de l'enfant.
  Aucun recours ne peut être introduit à l'encontre de la décision de renvoi.
  En cas de renvoi du litige, les articles 661 et 662 sont applicables.";
  2° le paragraphe 5 est complété par un alinéa rédigé comme suit :
  "Aucun recours ne peut être exercé à l'encontre de cette ordonnance.";
  3° le paragraphe 6 est remplacé par ce qui suit :
  " § 6. Lorsqu'il est saisi en application de l'article 11, 7, alinéa 1er, du Règlement du Conseil visé au § 1er, le tribunal examine, dans sa décision, les motifs et éléments de preuve sur lesquels repose la décision prise conformément à l'article 13 de la Convention de La Haye du 25 octobre 1980.
  La décision rendue en application de l'article 11, 7, alinéa 1er, du Règlement du Conseil visé au § 1er, peut également, à la demande de l'une des parties, porter sur le droit de visite.
  Le cas échéant, le tribunal indique, dans sa décision, le motif pour lequel l'enfant n'a pas été entendu.".

  Art. 106. L'article 1322duodecies du même Code, inséré par la loi du 10 mai 2007 et modifié par la loi du 30 juillet 2013, est complété par un paragraphe 4, rédigé comme suit :
  " § 4. Aucun recours ne peut être exercé à l'encontre d'une décision arrêtant des mesures protectionnelles en application de l'article 11, 4, du Règlement du Conseil visé à l'article 1322bis, 3°. ".

  TITRE 8. - Modifications relatives à la déclaration d'acceptation sous bénéfice d'inventaire et à la renonciation à une succession et à la création d'un registre central successoral

  CHAPITRE 1er. - Modifications du Code civil relatives aux déclarations d'acceptation sous bénéfice d'inventaire d'une succession et de renonciation à une succession

  Art. 107. L'article 784 du Code civil, remplacé par la loi du 25 avril 2014 et modifié par la loi du 12 mai 2014, est modifié comme suit :
  1° l'article est remplacé par ce qui suit :
  "Art. 784. La renonciation à une succession ne se présume pas : elle doit être faite par déclaration devant notaire, dans un acte authentique.
  Dans les quinze jours qui suivent l'acte authentique, la renonciation est publiée par mention au Moniteur belge, par les soins du notaire et aux frais du successible renonçant.
  Lorsque la ou les personnes qui renoncent déclarent sur l'honneur dans l'acte qu'à leur connaissance l'actif net de la succession ne dépasse pas 5 000 euros, la déclaration de renonciation visée à l'alinéa 1er est reçue et enregistrée gratuitement et exemptée de paiement de droit d'écriture et de frais de publication. Tous les trois ans, à la date anniversaire de l'entrée en vigueur de la présente disposition, le montant de 5 000 euros est adapté de plein droit à l'indice des prix à la consommation du mois qui précède celui de l'adaptation. L'indice de départ est celui du mois qui précède celui au cours duquel la présente disposition entre en vigueur.";
  2° l'alinéa 2, remplacé par le 1°, est remplacé par ce qui suit :
  "Dans les quinze jours qui suivent l'acte authentique, la renonciation est enregistrée, par les soins du notaire et aux frais du successible, dans le registre central successoral.".

  Art. 108. L'article 793 du même Code, remplacé par la loi du 12 mai 2014, est modifié comme suit :
  1° l'article est remplacé par ce qui suit :
  "Art. 793. La déclaration d'un héritier qu'il entend ne prendre cette qualité que sous bénéfice d'inventaire, doit être faite devant notaire, dans un acte authentique.
  Dans les quinze jours qui suivent l'acte authentique, l'acceptation sous bénéfice d'inventaire est publiée par mention au Moniteur belge par les soins du notaire et aux frais de l'héritier acceptant sous bénéfice d'inventaire, avec invitation aux créanciers et aux légataires d'avoir à faire connaître, par avis recommandé, leurs droits dans un délai de trois mois à compter de la date de publication.
  En cas d'acceptation sous bénéfice d'inventaire en raison de l'incapacité de l'héritier, la déclaration est faite par les père et mère ou celui d'entre eux qui exerce l'autorité parentale, par le mineur émancipé ou par le tuteur. Il est ensuite procédé conformément à l'alinéa 2. Le juge de paix veille à l'accomplissement de ces formalités. En cas d'opposition d'intérêts entre l'incapable et son représentant légal, le juge de paix désigne un tuteur ad hoc soit à la requête de toute personne intéressée, soit d'office.
  Sous réserve de justifications ultérieures de la réalité de leurs créances, les créanciers et légataires se font connaître par simple envoi recommandé adressé au domicile élu par l'héritier et indiqué dans l'insertion.";
  2° l'alinéa 2, remplacé par le 1°, est remplacé par ce qui suit :
  "Dans les quinze jours qui suivent l'acte authentique, l'acceptation sous bénéfice d'inventaire est, par les soins du notaire et aux frais de l'héritier acceptant sous bénéfice d'inventaire, enregistrée dans le registre central successoral, avec invitation aux créanciers et aux légataires d'avoir à faire connaître, par avis recommandé, leurs droits dans un délai de trois mois à compter de la date de l'enregistrement dans le registre.".

  CHAPITRE 2. - Introduction d'un registre central successoral

  Art. 109. Dans le livre III, titre Ier, du Code civil, il est inséré un chapitre VII intitulé "Du registre central successoral".

  Art. 110. Dans le chapitre VII, inséré par l'article 109, il est inséré un article 892/1 rédigé comme suit :
  "Art. 892/1. § 1er. Les actes et certificats d'hérédité qui sont établis par un notaire conformément à l'article 1240bis sont enregistrés dans le registre central successoral.
  § 2. Les certificats successoraux européens, qui sont établis conformément à l'article 68 du Règlement européen n° 650/2012 du Parlement européen et du Conseil du 4 juillet 2012 relatif à la compétence, la loi applicable, la reconnaissance et l'exécution des décisions, et l'acceptation et l'exécution des actes authentiques en matière de successions et à la création d'un certificat successoral européen, ainsi que les certificats successoraux européens qui sont établis par l'autorité judiciaire compétente conformément à l'article 72, § 2, in fine, du même Règlement sont enregistrés dans le registre central successoral.
  Les rectifications, modifications et retraits desdits certificats européens sont également enregistrés.
  § 3. Les actes portant la déclaration de renonciation, qui sont établis conformément à l'article 784, sont enregistrés dans le registre central successoral.
  § 4. Les actes portant la déclaration d'un héritier qu'il entend ne prendre cette qualité que sous bénéfice d'inventaire, qui sont établis conformément à l'article 793, sont enregistrés dans le registre central successoral.
  § 5. Le registre central successoral tient lieu de source authentique des données y reprises.".

  Art. 111. Dans le même chapitre, il est inséré un article 892/2, rédigé comme suit :
  "Art. 892/2. Les actes portant la déclaration d'un héritier qu'il entend ne prendre cette qualité que sous bénéfice d'inventaire, qui sont établis conformément à l'article 793, sont publiés par mention au Moniteur belge.".

  Art. 112. Dans le même chapitre, il est inséré un article 892/3, rédigé comme suit :
  "Art. 892/3. La gestion et l'organisation du registre central successoral sont confiées à la Fédération Royale du Notariat belge.".

  Art. 113. Dans le même chapitre, il est inséré un article 892/4, rédigé comme suit :
  "Art. 892/4. En ce qui concerne le registre visé à l'article 892/1, le gestionnaire est considéré comme le responsable du traitement au sens de l'article 1er, § 4, de la loi du 8 décembre 1992 relative à la protection de la vie privée à l'égard des traitements de données à caractère personnel.".

  Art. 114. Dans le même chapitre, il est inséré un article 892/5, rédigé comme suit :
  "Art. 892/5. Le gestionnaire désigne un délégué à la protection des données.".
  Celui-ci est plus particulièrement chargé :
  1° de la remise d'avis qualifiés en matière de protection de la vie privée, de la sécurisation des données à caractère personnel et des informations et de leur traitement;
  2° d'informer et conseiller le gestionnaire traitant les données à caractère personnel de ses obligations en vertu de la présente loi et du cadre général de la protection des données et de la vie privée;
  3° de l'établissement, de la mise en oeuvre, de la mise à jour et du contrôle d'une politique de sécurisation et de protection de la vie privée;
  4° d'être le point de contact pour la Commission pour la protection de la vie privée;
  5° de l'exécution des autres missions relatives à la protection de la vie privée et à la sécurisation qui sont déterminées par le Roi, après avis de la Commission pour la protection de la vie privée.
  Dans l'exercice de ses missions, le délégué à la protection des données agit en toute indépendance et fait directement rapport au gestionnaire.
  Le Roi peut, après avis de la Commission pour la protection de la vie privée, déterminer les règles sur base desquelles le délégué à la protection des données effectue ses missions.".

  Art. 115. Dans le même chapitre, il est inséré un article 892/6, rédigé comme suit :
  "Art. 892/6. L'accès aux informations du registre central successoral est gratuit.
  Sans préjudice de l'alinéa 1er, le Roi détermine, par arrêté délibéré en Conseil des ministres, après avis de la Commission de la protection de la vie privée, les données des actes et certificats d'hérédité établis par les notaires belges, des certificats successoraux européens, des déclarations de renonciation et des déclarations d'acceptation sous bénéfice d'inventaire, qui doivent être reprises par la Fédération Royale du Notariat belge dans le registre central successoral, la forme et les modalités de l'enregistrement, les modalités d'accès au registre, les autres actes concernant le droit des successions qui peuvent être enregistrés dans le registre, les modalités de la mention au Moniteur belge et le tarif des frais.".

  Art. 116. Dans le même chapitre, il est inséré un article 892/7, rédigé comme suit :
  "Art. 892/7. Le gestionnaire n'est pas autorisé à communiquer les données reprises dans le registre central successoral à d'autres personnes que celles qui y ont accès comme déterminé par le Roi en vertu de l'article 892/6.
  Quiconque participe, à quelque titre que ce soit, à la collecte, au traitement ou à la communication des données visées à l'alinéa 1er, ou a connaissance de ces données est tenu d'en respecter le caractère confidentiel.
  L'article 458 du Code pénal leur est applicable.".

  Art. 117. Dans le même chapitre, il est inséré un article 892/8, rédigé comme suit :
  "Art. 892/8. Le gestionnaire assure le contrôle du fonctionnement et de l'utilisation du registre.".

  CHAPITRE 3. - Abrogation de l'article 1185 du Code judiciaire relative aux déclarations de renonciation à une succession

  Art. 118. L'article 1185 du Code judiciaire, modifié en dernier lieu par la loi du 25 avril 2014, est abrogé.

  CHAPITRE 4. - Déclarations de renonciation gratuites

  Section 1re. - Modification du Code des Droits d'Enregistrement, d'Hypothèque et de Greffe

  Art. 119. L'article 161 du Code des Droits d'Enregistrement, d'Hypothèque et de Greffe, modifié en dernier lieu par l'ordonnance du 29 juillet 2015, est complété par le 18° rédigé comme suit :
  "18° la déclaration de renonciation devant un notaire visée à l'article 784, alinéa 1er, du Code civil, dans les conditions visées à l'alinéa 3 du même article.".

  Section 2. - Modification du Code des droits et taxes divers

  Art. 120. L'article 21 du Code des droits et taxes divers, rétabli par la loi du 19 décembre 2006 et modifié par la loi du 19 mai 2010, est complété par le 13° rédigé comme suit :
  "13° la déclaration de renonciation devant un notaire visée à l'article 784, alinéa 1er, du Code civil, dans les conditions visées à l'alinéa 3 du même article.".

  CHAPITRE 5. - Modification de la loi du 25 ventôse an XI contenant organisation du notariat

  Art. 121. L'article 117, § 3, de la loi du 25 ventôse an XI contenant organisation du notariat, inséré par la loi du 4 mai 1999, est complété par un alinéa 2 rédigé comme suit :
  "Le notaire peut récupérer auprès du Fonds notarial un montant de 100 euros, tva incluse, pour tout acte contenant une ou plusieurs déclarations de renonciation à succession conformément à l'article 784, alinéa 1er, du Code civil qu'il a reçu gratuitement en application de l'alinéa 3 du même article pour autant que l'acte ne contienne pas d'autres actes juridiques, déclarations ou constatations donnant lieu à honoraire ou salaire.".

  CHAPITRE 6. - Disposition transitoire

  Art. 122. Les articles 107, 1°, 108, 1°, et 119 à 121 s'appliquent à toute déclaration visée par ces dispositions faite à partir de l'entrée en vigueur de ces dispositions, quelle que soit la date d'ouverture de la succession.
  Les articles 107, 2°, 108, 2° et 110 s'appliquent à toute déclaration visée par ces dispositions faite à partir de l'entrée en vigueur de ces dispositions, quelle que soit la date d'ouverture de la succession.

  CHAPITRE 7. - Entrée en vigueur

  Art. 123. Les articles 107, 2°, 108, 2° et 109 à 117 entrent en vigueur à la date fixée par le Roi et au plus tard le 1er janvier 2020.

  TITRE 9. - Notariat

  CHAPITRE 1er. - Modifications du Code civil

  Art. 124. Dans l'article 976 du Code civil, remplacé par la loi du 2 février 1983, les modifications suivantes sont apportées :
  a) dans le 1°, les alinéas 4 à 6 sont abrogés;
  b) dans le 2°, les alinéas 3 à 5 sont abrogés.

  Art. 125. Dans l'article 1008 du même Code, remplacé par la loi du 2 février 1983 et modifié par la loi du 30 juillet 2013, les modifications suivantes sont apportées :
  1° les mots "qui fera mention du dépôt prévu à l'article 976" sont abrogés;
  2° l'article est complété par la phrase suivante :
  "Est déposée en annexe à la requête, une expédition du procès-verbal visé à l'article 976 avec une copie certifiée conforme du testament ainsi que, dans le cas d'un testament international, de l'attestation visée aux articles 9 et 10 de la loi du 2 février 1983 instituant un testament à forme internationale et modifiant diverses dispositions relatives au testament.".

  CHAPITRE 2. - Abrogation de la loi du 16 floréal an IV (5 mai 1796) et de l'article 16 du Titre III du décret des 29 septembre-6 octobre 1791

  Art. 126. La loi du 16 floréal an IV (5 mai 1796) qui détermine le lieu où doit être déposé, chaque année, le double du répertoire des actes reçus par les notaires publics est abrogée.

  Art. 127. L'article 16 du Titre III du décret des 29 septembre - 6 octobre 1791 sur la nouvelle organisation du notariat et sur le remboursement des offices de notaires, est abrogé.

  TITRE 10. - Dispositions procédurales diverses

  CHAPITRE 1er. - Modifications du Code judiciaire

  Art. 128. A l'article 19, alinéa 3, du Code judiciaire, remplacé par la loi du 26 avril 2007, les modifications suivantes sont apportées :
  1° les mots "en autant d'exemplaires qu'il y a de parties en cause, plus un" sont insérés entre les mots "ou adressée au greffe" et les mots "; le greffier convoque les parties";
  2° l'alinéa est complété par la phrase suivante :
  "Un exemplaire de la demande est joint à cette convocation.".

  Art. 129. Dans l'article 735, § 2, alinéa 2, deuxième tiret, du même Code, inséré par la loi du 26 avril 2007, les mots "alinéa 2" sont remplacés par les mots "alinéa 3".

  Art. 130. Dans l'article 736, alinéa 2, du même Code, les mots "avec la communication de ses conclusions" sont remplacés par les mots "avec l'envoi de ses conclusions".

  Art. 131. L'article 742 du même Code, remplacé par la loi du 24 juin 1970, est remplacé par ce qui suit :
  "Art. 742. Les parties remettent au greffe leurs conclusions ainsi qu'un inventaire des pièces communiquées. Elles reçoivent un accusé de réception de cette remise.
  La remise peut se faire soit par le dépôt au greffe ou à l'audience, soit par l'envoi par courrier postal ou par le système informatique désigné à cet effet. En cas d'envoi, la date de la remise est celle de la réception par le greffe.".

  Art. 132. Dans l'article 745 du même Code, modifié par la loi du 26 avril 2007, le mot "adressées" est remplacé par le mot "envoyées".

  Art. 133. A l'article 747 du même Code, remplacé par la loi du 26 avril 2007 et modifié par la loi du 30 juillet 2013, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans le paragraphe 2, alinéa 3, les mots "de la communication" sont remplacés par les mots "de l'envoi et de la remise";
  2° dans le paragraphe 2, alinéa 3, le mot "adressées" est remplacé par le mot "envoyées" et le mot "déposées" est remplacé par le mot "remises";
  3° le paragraphe 2, alinéa 6, est abrogé;
  4° l'article est complété par un paragraphe 4, rédigé comme suit :
  " § 4. Sans préjudice de l'application des exceptions prévues à l'article 748, §§ 1er et 2, ou de la possibilité pour les parties de modifier de commun accord les délais pour conclure convenus entre eux ou le calendrier de procédure arrêté par le juge, les conclusions qui sont remises au greffe ou envoyées à la partie adverse après l'expiration des délais sont d'office écartées des débats. Au jour fixé, la partie la plus diligente peut requérir un jugement, lequel est, en tout état de cause, contradictoire.".

  Art. 134. Dans l'article 748 du même Code, remplacé par la loi du 3 août 1992 et modifié par la loi du 26 avril 2007, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans le paragraphe 1er, alinéa 1er, le mot "déposées" est remplacé par le mot "remises";
  2° dans le paragraphe 2, alinéa 6, la deuxième phrase est remplacée par ce qui suit :
  "Au jour fixé, la partie la plus diligente peut requérir un jugement, lequel est, en tout état de cause, contradictoire.".

  Art. 135. Dans l'article 775, alinéa 1er, du même Code, remplacé par la loi du 26 avril 2007, les mots "observations écrites" sont remplacés par le mot "conclusions".

  Art. 136. L'article 803 du même Code est complété par un alinéa rédigé comme suit :
  "Lorsqu'à l'audience d'introduction il existe un doute raisonnable que l'acte introductif ait mis le défendeur défaillant en mesure de se défendre, le juge peut ordonner que cet acte soit signifié par exploit d'huissier de justice.".

  Art. 137. Dans l'article 804, alinéa 2, du même Code, remplacé par la loi du 3 août 1992, les mots "comparu conformément aux articles 728 ou 729 et a déposé au greffe ou à l'audience des conclusions" sont remplacés par les mots "remis des conclusions".

  Art. 138. L'article 806 du même Code, remplacé par la loi du 19 octobre 2015, est complété par les mots ", y compris les règles de droit que le juge peut, en vertu de la loi, appliquer d'office".

  Art. 139. Dans l'article 809 du même Code, le mot "communiquées" est remplacé par le mot "envoyées".

  Art. 140. Dans l'article 818 du même Code, les mots "à l'article 751 ou, le cas échéant, à l'article 752" sont remplacés par les mots "à l'article 747 ou, le cas échéant, à l'article 748".

  Art. 141. A l'article 875bis du même Code, inséré par la loi du 15 mai 2007 et remplacé par la loi du 19 octobre 2015, les modifications suivantes sont apportées :
  1° l'alinéa 1er est abrogé;
  2° l'article est complété par un alinéa rédigé comme suit :
  "Lorsque la recevabilité de l'action est contestée, le juge ne peut ordonner une mesure d'instruction qu'après que l'action concernée a été déclarée recevable, sauf lorsque la mesure a trait au respect de la condition de recevabilité invoquée.".

  Art. 142. L'article 1039, alinéa 3, du même Code est abrogé.

  Art. 143. Dans l'article 1047, alinéa 1er, du même Code, les mots "Tout jugement par défaut" sont remplacés par les mots "Tout jugement par défaut rendu en dernier ressort".

  Art. 144. Dans l'article 1050, alinéa 2, du même Code, remplacé par la loi du 19 octobre 2015, les mots ", d'office ou à la demande d'une des parties," sont insérés entre les mots "sauf si le juge" et les mots "en décide autrement,".

  Art. 145. L'article 1064 du même Code, remplacé par la loi du 3 août 1992, est abrogé.

  Art. 146. Dans l'article 1066, alinéa 2, du même Code, remplacé par la loi du 3 août 1992, les modifications suivantes sont apportées :
  1° au 2°, le mot "exclusivement" est inséré entre les mots "la décision entreprise contient" et les mots "un avant dire droit ou une mesure provisoire";
  2° le 6° est complété par les mots "ou dont l'exécution par provision est expressément autorisée ou refusée, les débats succincts étant limités à ces modalités particulières".

  Art. 147. L'article 1097, alinéa 3, du même Code, modifié par la loi du 10 avril 2014, est complété par les mots "ou si elle envisage de prononcer d'office une cassation sans renvoi visée à l'article 1109/1, alinéa 2, sans que le ministère public ait relevé cette possibilité dans des conclusions écrites".

  Art. 148. L'article 1109/1 du même Code, inséré par la loi du 10 avril 2014, est complété par un alinéa rédigé comme suit :
  "Si la Cour casse une autre décision que celle visée à l'alinéa 1er, elle peut prononcer une cassation sans renvoi, sauf s'il y a lieu de renvoyer la cause conformément à l'article 1110.".

  Art. 149. A l'article 1110 du même Code, modifié par la loi du 10 avril 2014, les modifications suivantes sont apportées :
  1° l'alinéa 1er est remplacé par ce qui suit :
  "En cas de cassation, la Cour de Cassation renvoie la cause, s'il y a lieu, soit devant une juridiction souveraine du même rang que celle qui a rendu la décision cassée, soit devant la même juridiction, autrement composée." ;
  2° un alinéa rédigé comme suit est inséré entre les alinéas 3 et 4 :
  "Cette juridiction se conforme à l'arrêt de la Cour de cassation sur le point de droit jugé par cette Cour. Aucun recours en cassation n'est admis contre la décision de cette juridiction, en tant que celle-ci est conforme à l'arrêt de cassation.".

  Art. 150. Les articles 1119 et 1120 du même Code sont abrogés.

  Art. 151. L'article 1121 du même Code est remplacé par ce qui suit :
  "Art. 1121. Dans les cas où l'annulation ou la cassation est prononcée en vertu des articles 1088 et 1089, le procureur général près cette Cour transmet les décisions rendues au ministre de la Justice qui, chaque année, en fait rapport aux Chambres législatives.".

  Art. 152. Dans l'article 1254, § 5, du même Code, inséré par la loi du 27 avril 2007, les mots "ou par conclusions communiquées à l'autre conjoint par exploit d'huissier ou par lettre recommandée à la poste avec accusé de réception" sont remplacés par les mots "ou par conclusions signifiées à l'autre conjoint par exploit d'huissier ou envoyées par lettre recommandée à la poste avec accusé de réception".

  Art. 153. L'article 1336 du même Code est remplacé par ce qui suit :
  "Art. 1336. La décision rejetant la demande de délais n'est pas susceptible d'opposition de la part du débiteur; le juge d'appel statue, le cas échéant, au plus tard dans les deux mois.".

  Art. 154. Dans l'article 1394/27, § 1er, alinéa 2, du même Code, inséré par la loi du 19 octobre 2015, le mot "citations" est remplacé par le mot "significations".

  Art. 155. L'article 1397 du même Code, remplacé par la loi du 19 octobre 2015, est remplacé par ce qui suit :
  "Art. 1397. Sauf les exceptions prévues par la loi ou sauf si le juge, d'office ou à la demande d'une des parties, en décide autrement moyennant une décision spécialement motivée, sans préjudice de l'article 1414, les jugements définitifs sont exécutoires par provision nonobstant appel et sans garantie si le juge n'a pas ordonné qu'il en soit constitué une.
  Sauf les exceptions prévues par la loi ou sauf si le juge, d'office ou à la demande d'une des parties, en décide autrement moyennant une décision spécialement motivée et sans préjudice de l'article 1414, l'opposition ou l'appel formé par la partie défaillante contre les jugements définitifs prononcés par défaut en suspendent l'exécution.
  L'exécution par provision est de droit pour les jugements avant dire droit, ce qui englobe tous les types de mesures provisoires.".

  Art. 156. A l'article 1398/1 du même Code, inséré par la loi du 30 juillet 2013 et remplacé par la loi du 19 octobre 2015, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans l'alinéa 1er, les mots "ou sauf si le juge, d'office ou à la demande d'une des parties, en décide autrement moyennant une décision spécialement motivée" sont insérés entre les mots "sauf dispositions spéciales" et les mots ", l'opposition contre";
  2° l'alinéa 2 est abrogé.

  Art. 157. A l'article 1399 du même Code, remplacé par la loi du 19 octobre 2015, les modifications suivantes sont apportées :
  1° l'alinéa 1er est complété par un 3° rédigé comme suit :
  "3° des décisions en matière disciplinaire.";
  2° un alinéa rédigé comme suit est inséré entre les alinéas 1er et 2 :
  "L'exécution du jugement est également suspendue pendant le délai dans lequel l'opposition ou l'appel peut être formé.";
  3° dans le dernier alinéa, les mots "de ces jugements" sont remplacés par les mots "des jugements visés à l'alinéa 1er, 1° et 2°, ".

  Art. 158. A l'article 1402 du même Code, les mots "Les juges d'appel ne peuvent" sont remplacés par les mots "Sans préjudice de l'application de l'article 1066, alinéa 2, 6°, les juges d'appel ne peuvent".

  Art. 159. L'article 1496 du même Code est abrogé.

  CHAPITRE 2. - Modification du Code civil

  Art. 160. Dans l'article 2244, § 1er, alinéa 1er, du Code civil, modifié par les lois des 25 juillet 2008 et 23 mai 2013, les mots ", une sommation de payer visée à l'article 1394/21 du Code judiciaire" sont insérés entre les mots "un commandement" et les mots "ou une saisie".

  CHAPITRE 3. - Modifications du Code d'instruction criminelle

  Art. 161. Dans l'article 435 du Code d'instruction criminelle, remplacé par la loi du 14 février 2014, un alinéa rédigé comme suit est inséré entre les alinéas 1er et 2 :
  "Cette juridiction se conforme à l'arrêt de la Cour de cassation sur le point de droit jugé par cette Cour. Aucun recours en cassation n'est admis contre la décision de cette juridiction, en tant que celle-ci est conforme à l'arrêt de cassation.".

  Art. 162. L'article 440 du même Code, remplacé par la loi du 14 février 2014, est abrogé.

  TITRE 11. - Modification de la loi du 25 ventôse an XI contenant organisation du notariat et de lois diverses en vue de la modernisation et la réduction de la charge de travail de justice

  CHAPITRE 1er. - Modifications de la loi du 25 ventôse an XI contenant organisation du notariat

  Art. 163. A l'article 2, alinéa 1er, de la loi du 25 ventôse an XI contenant organisation du notariat, remplacé par la loi du 4 mai 1999, le mot "soixante-sept" est remplacé par le mot "septante".

  Art. 164. A l'article 4 de la même loi, modifié par la loi du 9 avril 1980, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans le texte néerlandais, le mot "verblijf" est remplacé par le mot "kantoor";
  2° le mot "résider" est remplacé par les mots "avoir son étude", les mots "le lieu" sont remplacés par les mots "la résidence" et le mot "fixé" est remplacé par le mot "fixée".

  Art. 165. A l'article 6, alinéa 1er, 2°, de la même loi, remplacé par la loi du 4 mai 1999, les mots "un bureau" sont remplacés par les mots "une antenne" et les mots "52, § 1er " sont remplacés par les mots "52, § 1er et § 1er/1".

  Art. 166. A l'article 8 de la même loi, remplacé par l'arrêté royal n° 213 du 13 décembre 1935 et modifié par les lois des 1er mars 1950 et 4 mai 1999, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans l'alinéa 1er, les mots "ou cohabitant légal" sont insérés entre le mot "conjoint" et le mot "ou" et le mot "troisième" est remplacé par le mot "deuxième";
  2° dans l'alinéa 2, les mots "ou cohabitant légal" sont insérés entre le mot "conjoint" et les mots ", son parent".

  Art. 167. A l'article 9 de la même loi, remplacé par la loi du 4 mai 1999 et modifié par la loi du 18 juillet 2008, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans le paragraphe 2, les mots "mariés ou cohabitant légalement ensemble," sont insérés entre les mots "Deux notaires," et les mots "parents ou alliés" et les mots "concourir aux" sont remplacés par les mots "recevoir ensemble les";
  2° l'article est complété par un paragraphe 3 rédigé comme suit :
  " § 3. Un acte peut également être reçu à distance devant deux notaires ou plus, auquel cas les parties et autres personnes intervenantes comparaissent devant le notaire de leur choix et assistent à la réception de l'acte par voie de vidéoconférence, après accord de tous les intéressés. Les parties et personnes intervenantes qui ne sont pas présentes auprès du détenteur de la minute, sont représentées avec une procuration lors de la signature de l'acte.".

  Art. 168. A l'article 10 de la même loi, remplacé par la loi du 4 mai 1999, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans l'alinéa 4, première phrase, les mots "le cohabitant légal," sont insérés entre les mots "le conjoint," et les mots "les parents et alliés";
  2° dans l'alinéa 4, deuxième phrase, les mots "ou les cohabitants légaux" sont insérés entre les mots "Les conjoints" et les mots "ne peuvent";
  3° dans l'alinéa 5, les mots "ou cohabitant légal" sont insérés entre les mots "conjoint" et les mots ", ni leurs parents".

  Art. 169. A l'article 12 de la même loi, remplacé par la loi du 4 mai 1999 et modifié par les lois des 1er mars 2007, 6 mai 2009 et 21 décembre 2013, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans l'alinéa 1er, première phrase, dans le texte néerlandais, le mot "opmaakt" est remplacé par le mot "verlijdt";
  2° dans l'alinéa 1er, deuxième phrase, les mots "cette qualité et le siège de la société au lieu de sa résidence" sont remplacés par les mots "également la dénomination et le siège de la société dont il fait partie";
  3° dans l'alinéa 4, deuxième phrase, dans le texte néerlandais, le mot "in" est inséré entre les mots "in het eerste lid en" et les mots "het tweede lid";
  4° dans l'alinéa 6, le premier mot "reçu" est remplacé par le mot "communiqué".

  Art. 170. A l'article 19 de la même loi, modifié par les lois des 9 avril 1980 et 4 mai 1999, les modifications suivantes sont apportées :
  1° l'alinéa 1er est complété par la phrase suivante :
  "La force exécutoire s'étend à tous les engagements qui sont contractés dans l'acte.";
  2° dans l'alinéa 3, les mots "aux dispositions de l'article 12. L'acte le plus récent doit en outre contenir la déclaration des parties" sont remplacés par les mots "à l'article 12 et à condition que l'acte le plus récent contienne en outre la déclaration expresse, inconditionnelle et spécifique des parties" et les mots "avoir ensemble valeur d'acte authentique" sont remplacés par les mots "être exécutoire ensemble".

  Art. 171. A l'article 33 de la même loi, remplacé par l'arrêté royal n° 213 du 13 décembre 1935 et modifié par les lois des 26 juin 1947 et 4 mai 1999, les modifications suivantes sont apportées :
  1° un alinéa rédigé comme suit est inséré entre les alinéas 2 et 3 :
  "Les livres comptables doivent être conservés jusqu'à l'expiration de la dixième année suivant la date de leur clôture.";
  2° entre les alinéas 3 et 4 devenant les alinéas 4 et 10, cinq nouveaux alinéas sont insérés rédigés comme suit :
  "Afin d'être en mesure de constater à tout moment et immédiatement la situation de l'étude, la Chambre nationale des notaires récolte les informations comptables visées à l'alinéa 1er, par voie électronique, de manière permanente et sans limitation dans le temps. Ces données sont conservées jusqu'à l'expiration de la dixième année suivant la date à laquelle elles ont été récoltées.
  Les données ainsi récoltées sont traitées par la Chambre nationale des notaires qui s'assure du respect par le notaire de ses obligations comptables. Dans le cadre de ce contrôle, la Chambre nationale des notaires peut adopter toutes les mesures qui s'imposent à des fins préventives ou coercitives, sans préjudice de la compétence de la chambre des notaires.
  La Chambre nationale des notaires peut accorder à la chambre des notaires concernée, un droit d'accès aux données nécessaires et un droit de traitement de ces données, afin que celle-ci puisse exercer sa mission légale.
  La Chambre nationale des notaires conserve les informations relatives à l'accès aux données durant dix ans à dater de cet accès.
  Toutes les personnes amenées à prendre connaissance et à traiter les données susmentionnées, en application de cette réglementation, sont tenues au secret professionnel et au devoir de discrétion.";
  3° l'alinéa 4, devenant l'alinéa 10, est abrogé.

  Art. 172. A l'article 34 de la même loi, remplacé par la loi du 22 novembre 2013, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans le paragraphe 3, alinéa 1er, première phrase, les mots "22 mars 1993 relative au statut et au contrôle des établissements de crédit" sont remplacés par les mots "25 avril 2014 relative au statut et au contrôle des établissements de crédit et des établissements de bourse";
  2° dans le paragraphe 4, alinéa 2, le mot "deux" est remplacé par le mot "quatre";
  3° dans le paragraphe 4, alinéa 3, le nombre "2 500" est remplacé par le nombre "10 000" et les deux dernières phrases sont abrogées;
  4° dans le paragraphe 5, alinéa 1er, les mots "suivant la clôture du dossier" sont remplacés par les mots "à dater du jour où plus aucun acte ou plus aucune convention ne doivent être rédigés dans le dossier".

  Art. 173. A l'article 35 de la même loi, remplacé par la loi du 4 mai 1999 et modifié par les lois des 23 octobre 2009 et 14 novembre 2011, les modifications suivantes sont apportées :
  1° le paragraphe 2, alinéa 1er, est complété par les mots "ou, dans le cas visé à l'article 35bis, par le choix d'un rôle linguistique dans le cadre de l'introduction du dossier.";
  2° le paragraphe 3, 2°, est complété par les mots "ou du certificat d'aptitude prévu à l'article 35bis;".

  Art. 174. L'article 35bis de la même loi, abrogé par la loi du 4 mai 1999, est rétabli dans la rédaction suivante :
  "Art. 35bis. § 1er. Pour obtenir le certificat d'aptitude, l'intéressé doit préalablement choisir le rôle linguistique sur lequel il veut être inscrit et introduire un dossier auprès du ministre de la Justice prouvant que l'intéressé :
  1° a accompli avec succès un cycle d'études postsecondaires d'une durée minimale de trois ans à temps plein ou d'une durée équivalente à temps partiel dans une université ou dans un établissement d'enseignement supérieur ou dans un autre établissement d'un niveau de formation équivalent et, le cas échéant, la formation professionnelle requise en plus de ce cycle d'études, qui porte sur le droit, et qui peut produire les diplômes, certificats ou autres titres permettant l'exercice de la fonction de notaire dans l'Etat membre concerné;
  2° soit, a été nommé notaire par une décision officielle des pouvoirs publics d'un autre Etat membre, y travaille en qualité de notaire, dispose du sceau notarial octroyé par cet Etat et n'a pas été suspendu de sa fonction de notaire, soit, dispose de la preuve, délivrée par l'autorité de nomination d'un autre Etat membre, que les diplômes, certificats ou autres titres soumis conformément au 1° lui ouvrent dans cet Etat membre l'accès à la nomination dans la fonction de notaire par une décision officielle des pouvoirs publics qui l'autorise en outre à disposer du sceau notarial octroyé par cet Etat membre.
  Après vérification et confirmation du caractère complet des documents et pièces justificatives, le dossier est transmis par le ministre de la Justice à la commission de nomination pour le notariat du rôle linguistique choisi par l'intéressé.
  § 2. Après avoir pris connaissance du dossier, la commission de nomination concernée peut, si elle l'estime nécessaire, imposer un test d'aptitude comme mesure de compensation afin de vérifier la connaissance du droit national, qui est justifié par le fait que les circonstances dans lesquelles la fonction est ou peut être exercée dans l'Etat membre concerné ne sont pas identiques ou équivalentes à celles de la Belgique, et que cette différence explique la nécessité d'une formation spécifique qui porte sur des matières substantiellement différentes de celles couvertes par la formation dont l'intéressé fait état.
  Après vérification et validation des documents et preuves et, le cas échéant, après l'accomplissement du test d'aptitude visé à l'alinéa 1er, le certificat d'aptitude est délivré par la commission de nomination concernée.
  § 3. Le règlement d'ordre intérieur visé à l'article 38, § 11, peut fixer les modalités complémentaires de la procédure prévue au § 2.".

  Art. 175. A l'article 38, § 2, de la même loi, rétabli par la loi du 4 mai 1999 et modifié en dernier lieu par la loi du 27 avril 2016, les modifications suivantes sont apportées :
  1° l'alinéa 2, 1° est complété par les mots "ou qui ont opté pour une inscription au rôle linguistique néerlandais conformément à l'article 35bis;";
  2° dans le même alinéa, le 3° est rétabli comme suit : "3° la délivrance du certificat d'aptitude visé à l'article 35bis.";
  3° dans l'alinéa 3, le 1° est complété par les mots "ou qui ont opté pour une inscription au rôle linguistique français conformément à l'article 35bis;";
  4° dans le même alinéa, le 3° est rétabli comme suit :
  "3° la délivrance du certificat d'aptitude visé à l'article 35bis.".

  Art. 176. A l'article 39, § 1er, alinéa 1er, de la même loi, rétabli par la loi du 4 mai 1999, les mots "ou d'un certificat d'aptitude visé à l'article 35bis" sont insérés entre les mots "visé à l'article 36, § 4" et les mots ", qui souhaite devenir candidat-notaire".

  Art. 177. Dans l'article 43, § 1er, de la même loi, rétabli par la loi du 4 mai 1999, les phrases suivantes sont insérées entre la première et la deuxième phrase : "Le candidat-notaire nommé en vertu de sa participation au concours organisé par les commissions de nomination pour le notariat après avoir obtenu le certificat d'aptitude visé à l'article 35bis, remplit la condition de l'article 43, § 10, de la loi du 15 juin 1935 concernant l'emploi des langues en matière judiciaire sur la base du rôle linguistique de la commission de nomination qui l'a classé après ce concours. Il n'est pas exempté de respecter les conditions imposées par l'article 43, §§ 10 à 13 de ladite loi.".

  Art. 178. Dans l'article 44, § 3, de la même loi, rétabli par la loi du 4 mai 1999, l'alinéa 2 est complété par les mots "parmi les candidats classés par la commission de nomination".

  Art. 179. A l'article 47 de la même loi, modifié par l'arrêté royal n° 213 du 13 décembre 1935 et la loi du 9 avril 1980, les modifications suivantes sont apportées :
  1° l'alinéa 2 est abrogé;
  2° l'alinéa 3 est remplacé par ce qui suit :
  "Il sera tenu de faire enregistrer le procès-verbal de prestation de serment au greffe du tribunal de première instance de sa résidence.".

  Art. 180. L'article 49 de la même loi, remplacé par la loi du 16 avril 1927, est remplacé par ce qui suit :
  "Art. 49. Avant d'entrer en fonction, le notaire devra déposer au greffe du tribunal de première instance de sa résidence, ses signature et paraphe.".

  Art. 181. Dans l'article 50, de la même loi, remplacé par la loi du 25 avril 2014, les modifications suivantes sont apportées :
  a) au paragraphe 2, le 1° est complété par les mots "et qui sont membres d'une même compagnie; les notaires qui ont leur résidence dans les cantons de Limbourg-Aubel, de Malmedy-Spa-Stavelot, de Verviers-Herve et dans le deuxième canton de Verviers peuvent également s'associer soit avec des notaires dont la résidence est située dans l'arrondissement judiciaire d'Eupen, soit avec des notaires dont la résidence est située dans l'arrondissement judiciaire de Liège".
  b) au paragraphe 3, les mots ", a), alinéa premier" sont abrogés.

  Art. 182. A l'article 51 de la même loi, rétabli par la loi du 4 mai 1999 et modifié par la loi du 25 avril 2014, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans le paragraphe 1er, les mots "et les modalités d'indemnisation du notaire titulaire dont la résidence est devenue vacante à la suite de l'application de l'article 52" sont supprimés;
  2° dans le paragraphe 3, dans le a), les mots "visées à l'article 50, § 2, 3°. Dans le dernier cas, un notaire qui exerce sa profession dans la société notariale sera désigné comme représentant permanent pour l'exercice de ce mandat" sont remplacés par les mots "dont le seul détenteur de parts est un notaire qui exerce sa fonction dans la société notariale, et qui est désigné comme représentant permanent pour l'exercice de ce mandat";
  3° dans le paragraphe 5, alinéa 1er, les mots "le siège de la société" sont remplacés par les mots "leur résidence";
  4° le paragraphe 5 est complété par un alinéa rédigé comme suit :
  "Les mandats de justice dont un notaire associé est investi peuvent être exécutés de plein droit et sans désignation nouvelle, par les autres notaires de l'association.";
  5° dans le paragraphe 6, alinéa 1er, les mots "au siège de la société," sont insérés entre les mots "qui y sont inscrits" et les mots "par le notaire";
  6° dans le paragraphe 7, alinéa 1er, les mots "ou cohabitant légal" sont insérés entre le mot "conjoint" et le mot "ou" et le mot "troisième" est remplacé par le mot "deuxième";
  7° dans le paragraphe 7, alinéa 2, les mots "ou cohabitant légal" sont insérés entre les mots "son conjoint" et les mots ", son parent".

  Art. 183. A l'article 52 de la même loi, remplacé par la loi du 4 mai 1999 et modifié par la loi du 25 avril 2014, les modifications suivantes sont apportées :
  1° le paragraphe 1er est remplacé par ce qui suit :
  " § 1er. Le notaire qui désire exercer sa profession avec un ou plusieurs notaires de résidence différente doit maintenir une antenne au lieu de sa résidence, à l'exception de ce qui est prévu au paragraphe 1er/1.
  Le notaire peut, par dérogation à l'article 4, pour la durée de l'association, avoir son étude dans chaque antenne de l'association.
  Dans chaque antenne, le service notarial doit être organisé à part entière. Cela implique que le notaire ou au moins un collaborateur juridique qualifié soit présent dans l'antenne, qui doit être ouverte au moins seize heures par semaine, réparties sur quatre jours. La Chambre nationale des notaires établit les règles générales de ce service.";
  2° les paragraphes 1er/1 et 1er/2 sont insérés, rédigés comme suit :
  " § 1er/1. Des notaires de résidence différente dans une même commune et sur le territoire d'un même canton judiciaire, qui désirent exercer leur profession en association, doivent déplacer leur étude à la résidence de l'un d'entre eux pour la durée de cette association.
  § 1er/2. En aucun cas, une association ne peut comprendre plus de douze notaires. Ces notaires ne peuvent être issus de plus de cinq résidences.";
  3° dans le paragraphe 2, l'alinéa 7 est abrogé;
  4° le paragraphe 3 est remplacé par ce qui suit :
  " § 3. La société peut être dissoute par décision unanime des associés.";
  5° l'article est complété par les paragraphes 4 et 5, rédigés comme suit :
  " § 4. La communication relative à la création ou l'extension d'une association entre notaires titulaires est adressée conjointement par les notaires au ministre de la Justice, qui procède à la publication de cette association par un avis au Moniteur belge. A cette communication est joint le contrat approuvé par la chambre des notaires, visé à l'article 50, § 5.
  La fin de l'affectation comme notaire associé dans une société professionnelle, le retrait d'un associé ou la fin d'une association, fait l'objet d'un avis publié au Moniteur belge par le ministre de la Justice. En vue de cette publication, tous les associés doivent conjointement en aviser la chambre des notaires de la province où l'association a son siège. La chambre des notaires en informe sans délai le ministre de la Justice.
  § 5. Les avis publiés au Moniteur belge conformément au paragraphe 4 mentionnent la date à compter de laquelle la création ou l'extension de l'association, la fin de l'affectation comme notaire associé, le retrait d'un associé ou la fin de l'association sortira ses effets. A défaut de mention d'une date d'effet, cela se fera de plein droit au dixième jour après la date de publication.
  Lorsque, dans le cas d'une affectation comme notaire associé, le candidat-notaire doit encore se conformer aux articles 47, 48 et 49 en vertu du paragraphe 2, alinéa 4, la création ou l'extension de l'association ne prendra effet qu'au jour où ces obligations ont été remplies si cette date est postérieure à la date visé à l'alinéa 1er.".

  Art. 184. A l'article 53 de la même loi, remplacé par la loi du 4 mai 1999, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans le paragraphe 1er, alinéa 1er, les mots "190ter et 190quater des lois sur les sociétés commerciales, coordonnées le 30 novembre 1935" sont remplacés par les mots "334 à 341 du Code des sociétés.";
  2° le paragraphe 2 est complété par deux alinéas rédigés comme suit :
  "Dans le cas où, dans les deux ans suivant le jour où la place devient vacante, aucun nouveau titulaire n'a été nommé et n'a prêté serment, il est mis fin de plein droit à la désignation du ou des notaire(s) associé(s) non titulaire(s) après l'expiration de ce délai. La fin de cette désignation est publiée par un avis au Moniteur belge. Le paiement de l'indemnité qui lui (leur) revient conformément aux dispositions du contrat de société est suspendu jusqu'à la prestation de serment du nouveau notaire titulaire ou la suppression de la résidence.
  Sauf en cas de suppression de la résidence, la désignation d'un notaire suppléant sera demandée à la requête de la chambre des notaires compétente, selon la procédure prévue à l'article 64.";
  3° dans le paragraphe 4, les a) et d) sont supprimés et dans le e) les mots "prévue au b)" sont supprimés;
  4° le paragraphe 4 est complété par un alinéa rédigé comme suit :
  "Les extraits publiés au Moniteur belge conformément au présent paragraphe mentionnent la date à compter de laquelle la dissolution judiciaire de l'association ou l'exclusion sortira ses effets. A défaut de mention d'une date d'effet, cela se fera de plein droit au dixième jour après la date de publication.".

  Art. 185. A l'article 55, § 1er, de la même loi, remplacé par la loi du 4 mai 1999 et modifié par la loi du 25 avril 2014, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans le a), les mots "éléments meubles corporels et incorporels" sont remplacés par les mots "actifs mobiliers matériels et immatériels";
  2° dans le b), le mot "éléments" est remplacé par le mot "actifs";
  3° le paragraphe est complété par trois alinéas rédigés comme suit :
  "Si le patrimoine de la société comprend un immeuble affecté en tout ou en partie à l'étude notariale ou des droits réels sur ce bien, le cessionnaire a le choix, soit, de conserver l'immeuble ou les droits réels sur celui-ci dans la société, le cas échéant avec les crédits y afférents accordés à la société, soit, de faire céder l'immeuble ou les droits réels aux associés restants avant la cession des actions, avec les dettes y afférentes.
  Pour chaque option une valorisation séparée des actions à céder est établie.
  Le cessionnaire doit faire ce choix dans les soixante jours après la publication de sa nomination au Moniteur belge.".

  Art. 186. A l'article 64, § 1er, de la même loi, inséré par la loi du 4 mai 1999, les mots "candidats-notaires et les notaires" sont remplacés par les mots "candidats-notaires, les notaires et les notaires honoraires".

  Art. 187. Dans la même loi, il est inséré un article 76bis rédigé comme suit :
  "Art. 76bis. § 1er. Les compagnies des notaires jouissent d'une hypothèque légale afin de garantir la récupération de toutes sommes déjà versées ou encore à verser en raison de la situation financière d'une étude notariale dont l'aptitude à rembourser les sommes d'argent, titres et valeurs revenant à des clients est gravement compromise.
  Cette hypothèque est inscrite, au nom et pour le compte de la compagnie des notaires ou pour le compte de tiers, sur tous les biens et les droits, visés à l'article 1560 du Code judiciaire, appartenant au notaire et aux sociétés visées à l'article 50.
  § 2. Le montant pour lequel l'inscription hypothécaire est prise est préalablement déterminé par la chambre des notaires dont dépend le notaire concerné sur la base d'un rapport circonstancié de la commission de contrôle de la comptabilité visée à l'article 9 de l'arrêté royal du 10 janvier 2002 relatif à la gestion des sommes, titres et valeurs au porteur reçus par un notaire et au contrôle de la comptabilité des notaires. Ce rapport établit le montant vraisemblable des sommes qui pourraient justifier une éventuelle intervention financière en faveur des clients de l'étude.
  § 3. L'hypothèque légale est prise et radiée par décision de la chambre des notaires dont dépend le notaire concerné; elle prend rang depuis la date de son inscription et ne préjudicie pas aux privilèges et hypothèques antérieurs.
  § 4. Sur requête de la chambre des notaires précitée, l'hypothèque légale est fixée dans un acte authentique en vue de l'inscription conformément aux articles 82 à 84 de la Loi hypothécaire. La chambre des notaires est représentée dans cet acte conformément à l'article 85.
  § 5. L'inscription de l'hypothèque légale est rayée ou réduite en vertu d'un acte authentique dans lequel le notaire instrumentant confirme unilatéralement que la chambre des notaires qui a pris l'hypothèque a donné son accord à cette radiation ou réduction; toutes les inscriptions qui figurent dans l'acte soumis sont rayées ou diminuées d'office.".

  Art. 188. A l'article 77, alinéa 2, première phrase, de la même loi, inséré par la loi du 4 mai 1999, les mots "dans les quinze jours" sont remplacés par le mot "immédiatement".

  Art. 189. A l'article 91 de la même loi, inséré par la loi du 4 mai 1999, les modifications suivantes sont apportées :
  i) dans l'alinéa 1er, 5°, premier tiret, dans le texte néerlandais, les mots "het doorlopen van" sont insérés entre le mot "inzake" et les mots "de stage";
  ii) dans le deuxième tiret du même point, les mots "et à la tenue" sont remplacés par les mots ", à la tenue et au contrôle";
  iii) le même point est complété par un tiret rédigé comme suit :
  "- à l'estimation d'une étude notariale;";
  iv) dans le même alinéa, le 11° est complété par les mots "ainsi que celui du Fonds notarial visé à l'article 117;";
  v) le même alinéa est complété par le 12° rédigé comme suit :
  "12° d'établir une liste électronique des candidats-notaires, notaires titulaires, associés et suppléants et de veiller à sa mise à jour permanente. Sauf preuve contraire, en cas de discordance, les mentions de cette liste l'emportent sur toute autre mention. Cette liste est publique, sauf en ce qui concerne les candidats-notaires. Les données de cette liste sont conservées conformément à la durée de conservation des actes authentiques prévue par l'article 62 et conformément à la limite d'âge pour devenir notaire visée à l'article 2. Les données qui figurent dans cette liste sont déterminées par arrêté royal soumis à l'avis de la Commission de la protection de la vie privée.";
  vi) deux alinéas rédigés comme suit sont insérés entre les alinéas 1er et 2 :
  "Afin d'identifier les candidats-notaires, les notaires titulaires, associés et suppléants pour l'application de l'alinéa 1er, 12°, la Chambre nationale des notaires est autorisée :
  a) à utiliser le numéro du Registre national des candidats-notaires, notaires titulaires, associés et suppléants et à accéder aux informations visées à l'article 3, alinéa 1er, 1°, 2°, 6°, et alinéa 2, de la loi du 8 août 1983 organisant un registre national des personnes physiques;
  b) à accéder aux informations nom et prénoms, lieu et date de naissance et date de décès de la Banque-carrefour de la sécurité sociale.
  Le numéro du Registre national, le lieu et la date de naissance, le lieu et la date de décès des personnes physiques visées à l'alinéa précédent ne peuvent être communiqués au public.";
  vii) dans l'alinéa 3, devenant l'alinéa 5, le mot "deuxième" est remplacé par le mot "quatrième".

  Art. 190. L'intitulé du titre IV de la même loi, inséré par la loi du 4 mai 1999, est remplacé comme suit :
  "Titre IV. - De la discipline, des mesures conservatoires et d'appui".

  Art. 191. Au titre IV de la même loi, l'intitulé de la section Ire est remplacé comme suit :
  "Section Ire. Des peines disciplinaires, des mesures conservatoires et d'appui".

  Art. 192. L'article 95 de la même loi, inséré par la loi du 4 mai 1999, est complété par un alinéa rédigé comme suit :
  "Tout membre d'une compagnie des notaires qui manque à ses obligations comptables peut faire l'objet de mesures conservatoires et d'appui.".

  Art. 193. Dans la même loi, il est inséré un article 97bis rédigé comme suit :
  "Art. 97bis. Les mesures conservatoires sont des mesures, imposées par la chambre des notaires, qui ont pour but, dans le cadre des obligations comptables du notaire, de préserver les intérêts financiers de ses clients.
  Les mesures d'appui sont des mesures, imposées par la chambre des notaires, qui ont pour but d'apporter un appui au notaire dans le cadre de ses obligations comptables.".

  Art. 194. A l'article 117 de la même loi, inséré par la loi du 4 mai 1999 et modifié par l'arrêté royal du 20 juillet 2000, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans le paragraphe 2, les mots "acte de vente relatif à une première habitation familiale bénéficiant d'un droit d'enregistrement réduit de 6 %" sont remplacés par les mots "acte d'achat relatif à une seule habitation familiale pour laquelle une prime en matière de droits d'enregistrement s'applique", et les mots "de l'arrêté royal du 16 décembre 1950 portant le tarif des honoraires des notaires" sont remplacés par les mots "d'une disposition légale";
  2° le paragraphe 3 est complété par la phrase suivante :
  "Le Fonds notarial peut également, moyennant approbation par le ministre de la Justice, consacrer les moyens dont il dispose à d'autres fins sociales utiles ou à des projets issus du monde notarial.".

  Art. 195. Dans la même loi, il est inséré un article 119 rédigé comme suit :
  "Art. 119. § 1er. Le gestionnaire des fichiers visés aux articles 18, 33 et 91, 12°, est le responsable du traitement au sens de l'article 1er, § 4, de la loi du 8 décembre 1992 relative à la protection de la vie privée à l'égard des traitements de données à caractère personnel.
  § 2. Le gestionnaire visé au paragraphe 1er désigne un délégué à la protection des données.
  Celui-ci est plus particulièrement chargé :
  1° de la remise d'avis qualifiés en matière de protection de la vie privée, de la sécurisation des données à caractère personnel et des informations et de leur traitement;
  2° d'informer et conseiller le gestionnaire traitant les données à caractère personnel de ses obligations en vertu de la présente loi et du cadre général de la protection des données et de la vie privée;
  3° de l'établissement, de la mise en oeuvre, de la mise à jour et du contrôle d'une politique de sécurisation et de protection de la vie privée;
  4° d'être le point de contact pour la Commission pour la protection de la vie privée;
  5° de l'exécution des autres missions relatives à la protection de la vie privée et à la sécurisation qui sont déterminées par le Roi, après avis de la Commission pour la protection de la vie privée.
  Dans l'exercice de ses missions, le délégué à la protection des données agit en toute indépendance et fait directement rapport au gestionnaire.
  Le Roi peut, après avis de la Commission pour la protection de la vie privée, déterminer les règles sur la base desquelles le délégué à la protection des données effectue ses missions.".

  Art. 196. Dans la même loi, il est inséré un article 120, rédigé comme suit :
  "Art. 120. Quiconque participe, à quelque titre que ce soit, à la collecte, au traitement ou à la communication des données visées aux articles 18, 33 et 91, 12° ou a connaissance de telles données est tenu d'en respecter le caractère confidentiel.
  L'article 458 du Code pénal leur est applicable.".

  CHAPITRE 2. - Autres modifications

  Art. 197. L'article 19 de la loi du 6 mai 2009 portant des dispositions diverses est remplacé comme suit :
  "Art. 19. Dans l'article 13 de la même loi, modifié par les lois des 10 juillet 1951 et 26 juin 2000, les modifications suivantes sont apportées :
  1° l'alinéa 1er actuel est remplacé comme suit :
  "Les actes notariés sont établis d'une manière indélébile, lisiblement, sans abréviations, blancs, lacunes ni intervalles, sans préjudice des articles 971 à 998 et 1001 du Code civil relatifs aux testaments; chaque feuillet simple ou double d'un acte comportant plusieurs feuillets portera la mention de sa numérotation. Cette mention sera paraphée ou signée par tous les signataires de l'acte, à moins que le feuillet ne porte déjà leur paraphe ou signature; le tout, sous la responsabilité du notaire, et à peine d'une amende de 2,50 euros contre lui.";
  2° l'alinéa 2 actuel est remplacé comme suit :
  "Le Roi prescrit, par arrêté délibéré en Conseil des ministres, les mesures nécessaires afin de garantir l'inaltérabilité, la confidentialité et la conservation des actes notariés.";
  3° après l'alinéa 1er, il est inséré un nouvel alinéa rédigé comme suit :
  "L'acte notarié peut également être reçu sous forme dématérialisée. Les prescriptions visées à l'alinéa 1er pour les actes notariés qui sont reçus sur support papier, ne s'appliquent pas aux actes notariés reçus sous forme dématérialisée.".

  Art. 198. L'article 20 de la même loi, remplacé par la loi du 21 décembre 2013, est remplacé comme suit :
  "Art. 20. Dans l'article 18 de la même loi, abrogé par la loi du 9 avril 1980, sont apportées les modifications suivantes :
  1° l'article 18 est rétabli comme suit :
  "Art. 18. Le Roi détermine, par arrêté délibéré en Conseil des ministres, sur avis de la Commission de la protection de la vie privée, créée par la loi du 8 décembre 1992 relative à la protection de la vie privée à l'égard des traitements de données à caractère personnel, et après avis de la Fédération Royale du Notariat belge, dans le respect de l'article 23 et de l'article 458 du Code pénal, la manière dont et les conditions sous lesquelles la Banque des actes notariés sera créée, gérée et organisée, l'accès à celle-ci, ainsi que les modalités d'établissement et de conservation des copies dématérialisées des actes reçus conformément aux dispositions de l'article 13, alinéa 1er.";
  2° l'article, remplacé par le 1°, est remplacé comme suit :
  "Art. 18. § 1er. Une copie dématérialisée de tous les actes qui sont reçus conformément aux dispositions de l'article 13, alinéa 1er, est conservée dans une Banque des actes notariés gérée par la Fédération Royale du Notariat belge. La copie dématérialisée doit être déposée et enregistrée dans la Banque des actes notariés dans les quinze jours suivant la réception de l'acte. Cette copie a la même valeur probante que la première expédition de la minute sur support papier.
  Cette disposition ne vaut pas pour les testaments, les révocations de testament et les institutions contractuelles par acte séparé.
  Au moins une fois par an, il est procédé, pour le compte de la Chambre nationale des notaires, à un audit de la Banque des actes notariés, ayant trait, entre autres, au respect des exigences légales, à son intégrité et à ses aspects techniques. La Chambre nationale des notaires fait rapport au ministre de la Justice au sujet des résultats de l'audit et les suites que le gestionnaire de la Banque des actes notariés y donne.
  § 2. Le Roi détermine, par arrêté délibéré en Conseil des ministres, sur avis de la Commission de la protection de la vie privée, créée par la loi du 8 décembre 1992 relative à la protection de la vie privée à l'égard des traitements de données à caractère personnel, et après avis de la Fédération Royale du Notariat belge, dans le respect de l'article 23 et de l'article 458 du Code pénal, la manière dont et les conditions sous lesquelles la Banque des actes notariés sera créée, gérée et organisée, l'accès à celle-ci, ainsi que les modalités d'établissement et de conservation des copies dématérialisées.";
  3° dans le paragraphe 1er, modifié par le 2°, un alinéa rédigé comme suit est inséré entre les alinéas 1er et 2 :
  "La minute de l'acte qui est reçue sous forme dématérialisée conformément à l'article 13, alinéa 2, est déposée et conservée dans la Banque des actes notariés conformément à l'alinéa 1er. Dans ce cas, il ne faut pas déposer de copie dématérialisée.".

  Art. 199. L'article 25 de la même loi est remplacé comme suit :
  "Art. 25. L'article 1317 du Code civil, modifié par les lois des 11 mars 2003 et 4 mai 2016, est modifié comme suit :
  1° un alinéa rédigé comme suit est inséré entre les alinéas 2 et 3 :
  "La Banque des actes notariés instituée conformément à la loi du 16 mars 1803 contenant organisation du notariat a la valeur de source authentique pour les actes qui y sont enregistrés.";
  2° l'alinéa 3 est remplacé comme suit :
  "Les actes notariés qui sont reçus sous forme dématérialisée sont établis et conservés conformément à la loi du 16 mars 1803 contenant organisation du notariat. La Banque des actes notariés instituée conformément à cette même loi a la valeur de source authentique pour les actes qui y sont enregistrés.".

  Art. 200. L'article 26 de la même loi, modifié par la loi du 29 décembre 2010, est remplacé comme suit :
  "Art. 26. A l'exception de l'article 18, ce chapitre entre en vigueur comme suit :
  1° les articles 19, 1° et 2°, 20, 1°, et 24 produisent leurs effets le 1er janvier 2017 ;
  2° les articles 19, 3°, 20, 3°, 21, 22, 23 et 25, 2°, entrent en vigueur à une date à fixer par le Roi ;
  3° les articles 20, 2° et 25, 1°, entrent en vigueur à une date à fixer par le Roi et au plus tard le 1er janvier 2020.
  L'application des dispositions reprises à l'article 20 n'est obligatoire que pour les actes reçus à partir de la date visée à l'alinéa 1er, 2°. ".

  Art. 201. L'article 161 du Code des droits d'enregistrement, d'hypothèque et de greffe est complété par le 14° rédigé comme suit :
  "14° la procuration authentique visée à l'article 9, § 3, de la loi du 25 ventôse an XI contenant organisation du notariat.".

  Art. 202. A l'article 56 de la loi du 21 décembre 2013 portant des dispositions fiscales et financières diverses, les mots "dont la minute dématérialisée ou la copie dématérialisée y est conservée" sont remplacés par les mots "qui y sont conservés".

  Art. 203. L'article 21 du Code des droits et taxes divers, rétabli par la loi du 19 décembre 2006 et modifié en dernier lieu par la loi du 19 mai 2010, est complété par le 13° rédigé comme suit :
  "13° la procuration authentique visée à l'article 9, § 3, de la loi du 25 ventôse an XI contenant organisation du notariat.".

  CHAPITRE 3. - Dispositions transitoires

  Art. 204. L'article 52, § 1er, § 1er/1 et § 1er/2 de la loi du 25 ventôse an XI contenant organisation du notariat, tel que modifié par l'article 183, s'applique à l'association qui est constituée ou qui est élargie à un notaire d'une résidence différente de celle des autres associés, mais uniquement en ce qui concerne le maintien d'une antenne à la résidence de ce dernier, après l'entrée en vigueur du présent titre.
  Pour l'application de cette disposition, seules les limites administratives et judiciaires en vigueur au moment de la formation ou de l'extension de l'association sont prises en compte.
  L'article 117, § 2, de la loi du 25 ventôse an XI contenant organisation du notariat, tel que modifié par l'article 194, 1°, s'applique à tous les actes reçus après l'entrée en vigueur du présent titre. Les actes reçus avant cette entrée en vigueur restent soumis à l'ancienne réglementation.

  CHAPITRE 5. - Entrée en vigueur

  Art. 205. Les articles 171, 2°, 189, v) à vii), 195 et 196 entrent en vigueur le 1er janvier 2020.
  Le Roi peut fixer une date d'entrée en vigueur antérieure à celle mentionnée à l'alinéa 1er pour chacune de ces dispositions.

  TITRE 12. - Modification du Code d'instruction criminelle

  Art. 206. A l'article 334, alinéa 3, du Code d'instruction criminelle, remplacé par la loi du 21 décembre 2009, les mots ", le ou la chef du jury" sont abrogés.

  Art. 207. L'article 206 produit ses effets le 29 février 2016.

  TITRE 13. - Modification de l'article 33 et abrogation de l'article 84, alinéa 2, du Code pénal

  Art. 208. L'article 33 du Code pénal, modifié par les lois du 14 avril 2009 et du 5 février 2016, est complété par un alinéa rédigé comme suit :
  "Ils pourront prononcer la même interdiction pour la même durée à l'égard des coupables dont la peine criminelle aura été commuée en un emprisonnement de moins de dix ans.".

  Art. 209. L'article 84, alinéa 2, du même Code, remplacé par la loi du 21 décembre 2009, est abrogé.

  Art. 210. Les articles 208 et 209 entrent en vigueur le jour de la publication de la présente loi au Moniteur belge.

  TITRE 14. - Transposition en droit belge la Directive 2013/40/UE du Parlement européen et du Conseil du 12 août 2013 relative aux attaques contre les systèmes d'information et remplaçant la décision-cadre 2005/222/JAI du Conseil

  CHAPITRE 1er. - Disposition générale

  Art. 211. Le présent titre transpose la Directive 2013/40/UE du Parlement européen et du Conseil du 12 août 2013 relative aux attaques contre les systèmes d'information et remplaçant la décision-cadre 2005/222/JAI du Conseil.

  CHAPITRE 2. - Modifications du Code pénal

  Art. 212. A l'article 259bis du Code pénal, inséré par la loi du 30 juin 1994 et modifié en dernier lieu par la loi du 30 mars 2017, les modifications suivantes sont apportées :
  1° au paragraphe 1er, les mots "d'un emprisonnement de six mois à deux ans" sont remplacés par les mots "d'un emprisonnement de six mois à trois ans";
  2° au paragraphe 2 les mots "d'un emprisonnement de six mois à trois ans" sont remplacés par les mots "d'un emprisonnement de six mois à cinq ans";
  3° au paragraphe 2bis les mots "d'un emprisonnement de six mois à deux ans" sont remplacés par les mots "d'un emprisonnement de six mois à trois ans".

  Art. 213. A l'article 314bis du même Code, inséré par la loi du 30 juin 1994 et modifié par les lois des 26 juin 2000, 15 mai 2006 et 25 décembre 2016, les modifications suivantes sont apportées :
  1° au paragraphe 1er, les mots "d'un emprisonnement de six mois à un an" sont remplacés par les mots "d'un emprisonnement de six mois à deux ans";
  2° au paragraphe 2, alinéa 1er, les mots "d'un emprisonnement de six mois à deux ans" sont remplacés par les mots "d'un emprisonnement de six mois à trois ans";
  3° au paragraphe 2bis, les mots "d'un emprisonnement de six mois à un an" sont remplacés par les mots "d'un emprisonnement de six mois à deux ans".

  Art. 214. A l'article 550bis du même Code, inséré par la loi du 28 novembre 2000 et modifié par la loi du 15 mai 2006, les modifications suivantes sont apportées :
  1° au paragraphe 1er, alinéa 1er, les mots "d'un emprisonnement de trois mois à un an" sont remplacés par les mots "d'un emprisonnement de six mois à deux ans";
  2° au paragraphe 1er, alinéa 2, les mots "la peine d'emprisonnement est de six mois à deux ans" sont remplacés par les mots "la peine d'emprisonnement est de six mois à trois ans";
  3° au paragraphe 2, les mots "d'un emprisonnement de six mois à deux ans" sont remplacés par les mots "d'un emprisonnement de six mois à trois ans";
  4° au paragraphe 3, les mots "d'un emprisonnement de un à trois ans" sont remplacés par les mots "d'un emprisonnement de un à cinq ans".

  Art. 215. L'article 550ter, § 1er, du même Code, inséré par la loi du 28 novembre 2000 et modifié par la loi du 15 mai 2006, est complété par un alinéa rédigé comme suit :
  "La même peine sera appliquée lorsque l'infraction visée à l'alinéa 1er est commise contre un système informatique d'une infrastructure critique comme visée dans l'article 3, 4°, de la loi du 1er juillet 2011 relative à la sécurité et la protection des infrastructures critiques.".

  TITRE 15. - Modification de la loi du 15 mars 1874 sur les extraditions

  Art. 216. L'article 3 de la loi du 15 mars 1874 sur les extraditions, modifié par la loi du 14 janvier 1999, est complété par un alinéa rédigé comme suit :
  "Le procureur du Roi compétent émet une ordonnance de capture aux fins de la notification et de l'exécution de l'arrêté ministériel accordant l'extradition si la personne réclamée n'est plus privée de sa liberté aux fins d'extradition.".

  Art. 217. L'article 11 de la même loi est abrogé.

  TITRE 16. - Modification de la loi du 9 décembre 2004 sur la transmission policière internationale de données à caractère personnel et d'informations à finalité judiciaire, l'entraide judiciaire internationale en matière pénale et modifiant l'article 90ter du Code d'instruction criminelle

  Art. 218. L'article 6 de la loi du 9 décembre 2004 sur la transmission policière internationale de données à caractère personnel et d'informations à finalité judiciaire, l'entraide judiciaire internationale en matière pénale et modifiant l'article 90ter du Code d'instruction criminelle, est complété par un paragraphe 5 rédigé comme suit :
  " § 5. Si dans le cadre de l'exécution d'une demande d'entraide judiciaire des biens ont été saisis qui, conformément à la demande d'entraide judiciaire, forment l'objet de l'infraction, un tiers intéressé peut s'opposer à la transmission à l'autorité requérante de ces biens saisis.
  Le procureur du Roi communique par lettre recommandée, par fax ou par e-mail sa décision concernant la transmission des objets saisis à la personne chez qui les objets ont été saisis ainsi qu'aux tiers qui se seraient manifestés et, le cas échéant, à leurs avocats.
  L'opposition à la transmission est formée au moyen d'une requête motivée dans laquelle le tiers intéressé manifeste un intérêt légitime. La requête doit, à peine de déchéance, être introduite dans les 15 jours de la notification de la décision du procureur du Roi auprès de la chambre du conseil du lieu où le procureur du Roi qui a pris cette décision de transmission exerce ses fonctions.
  Seule la chambre du conseil est compétente pour se prononcer sur l'opposition contre la décision de transmission, à l'exclusion de la compétence du juge des référés.
  L'ordonnance de la chambre du conseil est susceptible de recours devant la chambre des mises en accusation.
  L'arrêt de la chambre des mises en accusation n'est pas susceptible de pourvoi en cassation.".

  TITRE 17. - Organisation judiciaire

  CHAPITRE 1er. - Modifications du Code judiciaire

  Art. 219. A l'article 66 du Code judiciaire, modifié par la loi du 1er décembre 2013, dont le texte existant formera le paragraphe 1er, les modifications suivantes sont apportées :
  1° la phrase liminaire du paragraphe 1er est remplacée par la phrase suivante :
  " § 1er. Sans préjudice de l'application du paragraphe 2, les audiences sont tenues au siège ou à la division de la juridiction. Le nombre, les jours et la durée des audiences ordinaires, y compris les audiences visées au paragraphe 2, sont déterminés dans un règlement particulier :";
  2° l'article 66 est complété par les paragraphes 2 et 3 rédigés comme suit :
  " § 2. Le ministre de la Justice peut arrêter, après consultation du président des juges de paix et des juges au tribunal de police, du Collège des cours et tribunaux, du Procureur du Roi, du greffier en chef et du bâtonnier de l'Ordre des avocats, qu'un juge de paix, moyennant application par analogie des règles relatives à la compétence territoriale, peut tenir des audiences dans un ancien lieu d'audience supprimé du canton ou dans un canton supprimé, dans un local qui est mis gratuitement à disposition par la commune concernée, en vertu d'une convention d'occupation conclue avec le ministre, et qui convient au bon déroulement des audiences, en ce compris la publicité des audiences qui n'ont pas lieu à huis-clos. L'arrêté détermine également les communes ou parties de communes qui sont censées constituer le ressort de ces lieux d'audience. Il s'applique pour la durée de la convention d'utilisation. L'arrêté et sa durée d'application sont publiés au Moniteur belge.
  § 3. Lorsqu'au sujet des audiences visées au paragraphe 2 un incident est soulevé avant tout autre moyen, sauf une exception d'incompétence, par le défendeur, ou lorsqu'il est soulevé d'office à l'ouverture des débats par le juge de paix, le demandeur peut requérir, avant la clôture des débats, que la cause soit renvoyée au président des juges de paix et des juges au tribunal de police, pour décision, à défaut de quoi le juge de paix statue lui-même, l'un et l'autre sans préjudice du règlement d'un conflit de compétence qui, le cas échéant, est tranché en priorité et porte également, s'il y a lieu, sur le lieu des audiences.
  Le cas échéant, la cause est portée devant le président ou le vice-président sans autres formalités que la mention du renvoi à la feuille d'audience et la transmission du dossier de la procédure par les soins du greffier. Les parties peuvent lui communiquer ainsi qu'aux autres parties des remarques par écrit dans les huit jours du renvoi, sauf si le juge de paix a réduit ce délai. Après l'expiration de ce délai, le président statue sans délai.
  Dans les décisions visées au présent paragraphe, une date peut être immédiatement fixée pour le traitement ultérieur. Si elles ne sont pas prises sur-le-champ et en présence des parties ou de leurs avocats, ces parties ou leurs avocats en sont informés par simple lettre missive. Ces décisions ne sont susceptibles d'aucun recours. La décision n'est pas un jugement définitif au sens de l'article 1050.".

  Art. 220. Dans l'article 71 du même Code, remplacé par la loi du 1er décembre 2013, deux alinéas rédigés comme suit sont insérés entre les alinéas 1er et 2 :
  "En fonction des nécessités du service, le président des juges de paix et des juges au tribunal de police délègue un juge suppléant à une justice de paix qui y consent pour exercer ses fonctions à titre complémentaire dans un autre canton de l'arrondissement.
  Sans préjudice de l'article 65, § 1er, alinéa 2, et dans le respect de la loi du 15 juin 1935 concernant l'emploi des langues en matière judiciaire, en fonction des nécessités du service le premier président de la cour d'appel délègue un juge suppléant au tribunal de police qui y consent dans un autre tribunal de police du ressort ou un juge suppléant à une justice de paix qui y consent dans un canton situé dans un autre arrondissement, pour y exercer ses fonctions à titre complémentaire.".

  Art. 221. A l'article 76 du même Code, remplacé par la loi du 30 juillet 2013 modifiée par la loi du 8 mai 2014 et modifié par la loi du 4 mai 2016, les modifications suivantes sont apportées :
  1° le paragraphe 5 est complété par les mots ", de l'article 16 de la loi du 19 décembre 2003 relative au mandat d'arrêt européen et des articles 3 et 5 de la loi du 15 mars 1874 sur les extraditions";
  2° l'article est complété par le paragraphe 6 rédigé comme suit :
  " § 6. En cas de risque pour la sécurité, le président du tribunal de première instance peut, sur réquisition écrite ou orale du procureur du Roi, ordonner que le tribunal correctionnel tienne une ou plusieurs audiences dans une affaire déterminée au siège d'un tribunal de première instance du ressort de la cour d'appel et, s'il échet, que cette affaire y soit jugée.".

  Art. 222. Dans la deuxième partie, livre Ier, titre Ier, chapitre II, du même Code, la section VIbis, abrogée par la loi du 1er décembre 2013, est rétablie dans la rédaction suivante :
  "Section VIbis. - Du déplacement temporaire du siège d'un tribunal ou d'une division d'un tribunal".

  Art. 223. Dans la section VIbis, rétablie par l'article 222, il est inséré un article 86bis, abrogé par la loi du 1er décembre 2013 et rétabli dans la rédaction suivante :
  "Art. 86bis. Si les nécessités du service ou des circonstances de force majeure le justifient, le Roi peut, par arrêté délibéré en Conseil des ministres, sur proposition ou après avis du chef de corps et, selon le cas, du procureur du Roi ou de l'auditeur du travail ainsi que du greffier en chef et du ou des bâtonniers de l'Ordre ou des Ordres des avocats, transférer temporairement le siège d'une division dans une autre commune de l'arrondissement ou du ressort. Dans les tribunaux ne comportant qu'un siège, ce siège peut dans les mêmes conditions être transféré dans une autre commune de l'arrondissement ou du ressort.".

  Art. 224. Dans le même Code, l'article 99bis, abrogé par la loi du 19 octobre 2015, est rétabli dans la rédaction suivante :
  "Art. 99bis. Dans l'arrondissement judiciaire d'Eupen, les juges nommés au tribunal de première instance, au tribunal de commerce et au tribunal du travail peuvent être délégués par le président du tribunal de première instance, avec leur consentement, pour exercer la fonction de juge de paix ou de juge au tribunal de police dans une justice de paix ou le tribunal de police de l'arrondissement.
  L'ordonnance de délégation indique les motifs pour lesquels il est nécessaire de faire appel à un juge de l'un de ces trois tribunaux de l'arrondissement et précise les modalités de la délégation.".

  Art. 225. A l'article 101 du même Code, remplacé par la loi du 30 juillet 2013 modifiée par la loi du 8 mai 2014 et modifié par la loi du 25 décembre 2016, les modifications suivantes sont apportées :
  1° le paragraphe 1er est complété par un alinéa rédigé comme suit :
  "Le Roi peut, après avis du premier président, du procureur général, du greffier en chef et des bâtonniers des barreaux du ressort de la cour d'appel, déterminer qu'une ou plusieurs chambres de la jeunesse ou chambres de la famille siègent au siège du tribunal de première instance ou d'une division du tribunal de première instance dans une autre province du ressort de la cour pour traiter des appels contre les jugements rendus par les tribunaux de la famille et de la jeunesse de la province en question.";
  2° dans le paragraphe 2, alinéa 6, les mots "sont nommés" sont remplacés par les mots "peuvent être nommés";
  3° le paragraphe 3 est complété par les mots ", des articles 14 et 17 de la loi du 19 décembre 2003 relative au mandat d'arrêt européen et des articles 3 et 5 de la loi du 15 mars 1874 sur les extraditions";
  4° l'article est complété par un paragraphe 4 rédigé comme suit :
  " § 4. En cas de risque pour la sécurité, le premier président de la cour d'appel peut, sur réquisition écrite ou orale du procureur général, ordonner qu'une chambre correctionnelle de la cour d'appel tienne une ou plusieurs audiences dans une affaire déterminée au siège d'un tribunal de première instance du ressort de la cour d'appel et, s'il échet, que cette affaire y soit jugée.".

  Art. 226. Dans la deuxième partie, livre Ier, titre Ier, chapitre III, du même Code, il est inséré une section VI intitulée :
  "Section VI. - Du déplacement temporaire du siège d'une cour ou d'une division d'une cour".

  Art. 227. Dans la section VI, insérée par l'article 226, il est inséré un article 113quater rédigé comme suit :
  "Art. 113quater. Si les nécessités du service ou des circonstances de force majeure le justifient, le Roi peut, par arrêté délibéré en Conseil des ministres, sur proposition ou après avis du premier président de la cour d'appel ou de la cour du travail et du procureur général près la cour d'appel et la cour du travail ainsi que du greffier en chef et des bâtonniers des barreaux du ressort de la cour, transférer temporairement le siège d'une division dans une autre commune du ressort. Dans les cours ne comportant qu'un siège, ce siège peut dans les mêmes conditions être transféré dans une autre commune du ressort.".

  Art. 228. Dans l'article 159 du même Code, rétabli par la loi du 25 avril 2007 et modifié par les loi des 1er décembre 2013 et 25 décembre 2016, l'alinéa 4, inséré par la loi du 1er décembre 2013, est complété par les phrases suivantes :
  "Le greffier en chef des justices de paix et du tribunal de police de l'arrondissement peut désigner un membre du personnel de niveau A ou B des justices de paix de l'arrondissement, qui y consent, dans un tribunal de police de l'arrondissement, ou désigner un membre du personnel de niveau A ou B du tribunal de police, qui y consent, dans une justice de paix de l'arrondissement. Pour les justices de paix et les tribunaux de police de l'arrondissement judiciaire de Bruxelles, cette compétence appartient au président du tribunal de première instance. Le président du tribunal de première instance compétent est déterminé conformément à l'article 186bis, alinéas 2 à 7.".

  Art. 229. Dans l'article 160 du même Code, remplacé par la loi du 25 avril 2007 et modifié par les lois des 10 avril 2014 et 8 mai 2014, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans le paragraphe 1er, l'alinéa 4 est abrogé;
  2° il est inséré un paragraphe 3/1 rédigé comme suit :
  " § 3/1. Le Roi classifie les fonctions de niveau A sur la base de leur pondération conformément au § 3.
  Par dérogation à l'alinéa 1er le Roi peut classifier des fonctions conformément à la classification applicable au personnel de niveau A des services publics fédéraux.";
  3° dans le paragraphe 4, alinéa 1er, le chiffre "1°, " est abrogé, les mots "collège des procureurs généraux" sont remplacés par les mots "Collège du ministère public" et les mots "proposition conforme des premiers présidents des cours d'appel et des cours du travail" sont remplacés par les mots "proposition du collège des cours et tribunaux";
  4° dans le paragraphe 6, les mots "au sens de l'article 7 de la loi du 19 décembre 1974 organisant les relations entre les autorités publiques et les syndicats des agents relevant de ces autorités" sont abrogés;
  5° dans le paragraphe 7, alinéa 2, les mots "fonctions- types d'une classe de métiers" sont remplacés par les mots "fonctions d'une classe".

  Art. 230. Dans l'article 161 du même Code, remplacé par la loi du 25 avril 2007 et modifié par la loi du 10 avril 2014, l'alinéa 3 est remplacé par ce qui suit :
  "Selon le cas, sur la demande du Collège du ministère public ou du Collège des cours et tribunaux, le ministre qui a la Justice dans ses attributions peut charger les comités de pondération visés à l'article 160, § 3, de pondérer une fonction du niveau B.".

  Art. 231. L'article 164, alinéa 3, du même Code, inséré par la loi du 1er décembre 2013, est complété par les phrases suivantes :
  "Lorsque conformément à l'article 157, alinéa 1er, plusieurs greffiers en chef deviennent titulaires d'un même greffe en raison de l'attachement d'un même greffe à plusieurs justices de paix, ces greffiers en chef sont compétents pour la totalité des territoires des cantons auxquels ce même greffe est attaché. La répartition du service et la direction incombent au greffier en chef qui y consent et qui a été désigné à cet effet par le ou les président(s) compétent(s) du tribunal de première instance conformément à l'article 72bis, alinéas 2 à 4. Lorsque suite à des cessations de fonction, il ne subsiste qu'un seul greffier en chef, il devient, sans que l'article 287sexies soit d'application, titulaire de ce greffe sans devoir prêter serment à nouveau.".

  Art. 232. Dans l'article 182 du même Code, rétabli par la loi du 18 février 2014, l'alinéa 9 est remplacé par ce qui suit :
  "Pour la durée du mandat des membres du Collège, une liste de successeurs est établie, composée des chefs de corps non élus dans l'ordre du nombre de votes reçus. En cas d'absence ou d'empêchement, d'ouverture prématurée du mandat au sein du Collège ou de perte de la qualité requise pour siéger au sein du Collège, le membre concerné, le cas échéant pour la durée de son absence ou de son empêchement ou pour la durée restante de son mandat, est remplacé par le premier successeur en rang utile issu du même type de juridiction et du même rôle linguistique de la liste des successeurs. A défaut, le membre est remplacé par le chef de corps du même type de juridiction et du même rôle linguistique comptant le plus grand nombre d'années d'ancienneté au siège.".

  Art. 233. Dans l'article 184 du même Code, rétabli par la loi du 18 février 2014, le paragraphe 2 est complété par un alinéa rédigé comme suit :
  "Lorsqu'un représentant du Conseil des procureurs du Roi ou du Conseil des auditeurs du travail perd sa qualité de magistrat ou de chef de corps au cours de son mandat, il est remplacé par un successeur issu d'une liste établie selon des modalités fixées par le Roi.".

  Art. 234. Dans l'article 186ter du même Code, inséré par la loi du 1er décembre 2013, à l'alinéa 1er, 2°, les mots "avoir accompli le stage judiciaire prévu par l'article 259octies" sont remplacés par les mots "être détenteur du certificat attestant qu'il a achevé avec fruit le stage judiciaire prévu par l'article 259octies".

  Art. 235. Dans l'article 187, § 1er, du même Code, remplacé par la loi du 18 juillet 1991 et modifié par les lois du 22 décembre 1998 et du 1er décembre 2013, les mots "avoir accompli le stage judiciaire prévu par l'article 259octies" sont remplacés par les mots "être détenteur du certificat attestant qu'il a achevé avec fruit le stage judiciaire prévu par l'article 259octies".

  Art. 236. Dans l'article 189, § 1er, 2°, du même Code, modifié par la loi du 22 décembre 1998, les mots "avoir accompli le stage judiciaire prévu par l'article 259octies" sont remplacés par les mots "être détenteur du certificat attestant qu'il a achevé avec fruit le stage judiciaire prévu par l'article 259octies".

  Art. 237. Dans l'article 190 du même Code, renuméroté par la loi du 22 décembre 1998, au paragraphe 1er, modifié en dernier lieu par la loi du 1er décembre 2013, les mots "avoir accompli le stage judiciaire prévu par l'article 259octies, § 2" sont remplacés par les mots "être détenteur du certificat attestant qu'il a achevé avec fruit le stage judiciaire prévu par l'article 259octies".

  Art. 238. L'article 191 du même Code, rétabli par la loi du 22 décembre 2003 et modifié par la loi du 1er décembre 2013, est abrogé.

  Art. 239. Dans l'article 193, § 1er, 2°, du même Code, remplacé par la loi du 22 décembre 1998, les mots "avoir accompli le stage judiciaire prévu par l'article 259octies" sont remplacés par les mots "être détenteur du certificat attestant qu'il a achevé avec fruit le stage judiciaire prévu par l'article 259octies".

  Art. 240. Dans l'article 194, § 1er, du même Code, remplacé par la loi du 22 décembre 1998 et modifié par la loi du 1er décembre 2013, les mots "avoir accompli le stage judiciaire prévu par l'article 259octies" sont remplacés par les mots "être détenteur du certificat attestant qu'il a achevé avec fruit le stage judiciaire prévu par l'article 259octies".

  Art. 241. Dans l'article 207, § 3, 3°, du même Code, remplacé par la loi du 22 décembre 1998, les mots "avoir accompli le stage judiciaire prévu par l'article 259octies" sont remplacés par les mots "être détenteur du certificat attestant qu'il a achevé avec fruit le stage judiciaire prévu par l'article 259octies".

  Art. 242. A l'article 210 du même Code, remplacé par la loi du 22 décembre 1998 et modifié par les lois des 30 juillet 2013 et 19 octobre 2015, les modifications suivantes sont apportées :
  1° l'alinéa 1er est complété par les mots "ou parmi les magistrats suppléants visés à l'article 156bis";
  2° un alinéa rédigé comme suit est inséré entre les alinéas 1er et 2 :
  "Toutefois, après avoir demandé l'avis écrit motivé du procureur général et des bâtonniers de l'Ordre des avocats, tous les conseillers effectifs à la cour d'appel peuvent, indépendamment de leur ancienneté, siéger en qualité de conseiller unique, lorsque le premier président de la cour d'appel en démontre la nécessité.";
  3° dans l'alinéa 2, qui devient l'alinéa 3, les mots "visés à l'alinéa précédent" sont remplacés par les mots "visés à l'alinéa 1er".

  Art. 243. Dans l'article 259bis-2 du même Code, inséré par la loi du 22 décembre 1998 et modifié par les lois des 19 décembre 2002 et 23 novembre 2015, il est inséré un paragraphe 4/1 rédigé comme suit :
  " § 4/1. Les candidats qui ont été repris dans les listes définitives des candidats et qui n'ont pas été élus peuvent, dans un délai de cinq jours à compter de l'envoi de l'extrait du procès-verbal de l'élection, introduire, par courrier électronique adressé au président du Conseil supérieur, une réclamation concernant la régularité des opérations électorales, le dépouillement, le classement des candidats ou la désignation des élus.
  Le candidat qui introduit la réclamation doit avoir un intérêt. La réclamation doit, sous peine d'irrecevabilité, être motivée et être accompagnée des pièces justificatives en sa possession.
  Le Bureau se prononce, dans les huit jours de la réception de la réclamation, sur sa recevabilité. Il communique la décision par courrier électronique au demandeur dans les cinq jours et une copie de la réclamation déclarée recevable par courrier électronique au ministre qui a la Justice dans ses attributions et aux autres candidats.
  Les autres candidats peuvent, dans les cinq jours à compter de l'envoi de la copie, transmettre leurs observations par courrier électronique au président du Conseil supérieur.
  Lorsque la réclamation est déclarée recevable, le Bureau désigne un de ses membres ou un membre du Conseil supérieur qui n'est pas candidat en vue de procéder à une enquête et d'en faire rapport à l'assemblée générale. Le membre désigné est compétent pour faire toutes les constatations utiles, entendre toute personne concernée, solliciter et examiner tout document pertinent. Les bulletins de vote peuvent seulement être examinés en présence de deux témoins magistrats, membres du Conseil supérieur qui ne sont pas candidats. Les enveloppes qui contiennent les bulletins de vote sont à nouveau scellées en leur présence à l'issue de cet examen.
  Dans les quarante jours de la réception de la réclamation et après avoir entendu l'auteur de la réclamation, l'assemblée générale du Conseil supérieur, à l'exclusion des membres-magistrats qui sont candidats, statue et communique cette décision par courrier électronique à l'auteur de la réclamation et une copie par courrier électronique au ministre qui a la Justice dans ses attributions et aux autres candidats.
  Si la réclamation est déclarée fondée et que l'irrégularité constatée aurait pu avoir une influence sur le classement des candidats, la désignation des élus ou l'établissement de la liste des successeurs conformément au paragraphe 4, alinéa 2, l'assemblée générale prend les mesures nécessaires pour rectifier cette irrégularité.".

  Art. 244. A l'article 259bis-9 du même Code, inséré par la loi du 22 décembre 1998 et modifié en dernier lieu par la loi du 4 mai 2016, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans le paragraphe 1er, deux alinéas rédigés comme suit sont insérés entre les alinéas 2 et 3 :
  "Les candidats qui s'inscrivent à l'examen d'aptitude professionnelle doivent, au moment de leur inscription, être licenciés ou détenteurs d'un master en droit et avoir, au cours des cinq années précédant l'inscription et à titre d'activité professionnelle principale, exercé des fonctions juridiques pendant au moins quatre ans en tant que titulaire du diplôme de licencié ou de master en droit.
  Les candidats qui ont échoué cinq fois à l'examen d'aptitude professionnelle sont exclus de toute participation ultérieure à cet examen.";
  2° il est inséré un paragraphe 1er/1 rédigé comme suit :
  " § 1er/1. Un concours d'admission au stage judiciaire est organisé à la demande du ministre qui a la Justice dans ses attributions ou de son délégué. A la demande du ministre qui a la Justice dans ses attributions ou de son délégué, un second concours d'admission au stage judiciaire est organisé au cours de la même année judiciaire.
  La commission de nomination transmet sans délai au ministre qui a la Justice dans ses attributions le nombre de lauréats de la partie écrite du concours d'admission au stage judiciaire et transmet sans délai au ministre qui a la Justice dans ses attributions le classement définitif des lauréats du concours.
  Les lauréats du concours d'admission au stage judiciaire peuvent, au plus tard quatre ans après la clôture du concours, être nommés stagiaire judiciaire. Parmi les lauréats de plusieurs concours d'admission au stage judiciaire, priorité est donnée à ceux dont le nom figure sur la liste qui porte la date de publication au Moniteur belge la plus récente.
  Les candidats qui ont échoué cinq fois au concours d'admission au stage judiciaire sont exclus de toute participation ultérieure au concours d'admission au stage judiciaire.";
  3° dans le paragraphe 4, les mots "au cours de l'année qui suit leur nomination" sont remplacés par les mots "au cours des deux années qui suivent leur nomination".

  Art. 245. A l'article 259ter du même Code, inséré par la loi du 22 décembre 1998 et modifié en dernier lieu par la loi du 4 mai 2016, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans le paragraphe 2, alinéa 4, d), les mots ", le certificat attestant que le stage judiciaire a été achevé avec fruit" sont insérés entre les mots "commission d'évaluation compétente" et les mots "et les rapports de stage";
  2° dans le paragraphe 4, alinéa 3, les mots "six mois" sont remplacés par les mots "cinq mois".

  Art. 246. A l'article 259quater du même Code, inséré par la loi du 22 décembre 1998 et modifié en dernier lieu par la loi du 4 mai 2016, les modifications suivantes sont apportées :
  a) le paragraphe 2, alinéa 1er, est complété par les 4° à 6° rédigés comme suit :
  "4° du premier président de la cour et de l'assemblée générale de la cour lorsque la désignation dans le mandat de président emporte une nomination de conseiller au sein d'une cour d'appel ou d'une cour du travail; l'avis ne porte dans ce cas que sur la nomination comme conseiller;
  5° du procureur général près la cour d'appel lorsque la désignation dans le mandat de procureur du Roi ou d'auditeur du travail emporte une nomination de substitut du procureur général près la cour d'appel ou de substitut général près la cour du travail; l'avis ne porte dans ce cas que sur la nomination comme substitut du procureur général près la cour d'appel ou de substitut général près la cour du travail;
  6° du procureur général près la cour d'appel lorsque la désignation dans le mandat de procureur fédéral emporte une nomination de substitut du procureur général près la cour d'appel et une désignation d'office comme 1er avocat général; l'avis ne porte dans ce cas que sur la nomination de substitut du procureur général près la cour d'appel et la désignation d'office comme premier avocat général.";
  b) dans le paragraphe 2, alinéa 2, première phrase, les mots "soit le premier président de la cour d'appel pour le président des juges de paix et des juges au tribunal de police," sont insérés entre les mots "Cour de cassation," et les mots "soit par le président du collège";
  c) dans le paragraphe 3bis, l'alinéa 2 est abrogé;
  d) le paragraphe 4 est remplacé comme suit :
  " § 4. A moins qu'il ne soit déjà désigné dans ce mandat ou nommé dans cette fonction, la désignation d'un magistrat comme chef de corps d'un tribunal, d'une cour, des juges de paix et des juges au tribunal de police, d'un parquet, d'un auditorat du travail ou d'un parquet général emporte une désignation subsidiaire temporairement en surnombre, dans le mandat adjoint ou une nomination dans la fonction suivante qui ne sera exercé qu'à l'expiration du deuxième mandat et pour autant que le chef de corps sortant ait obtenu une évaluation positive au cours de la cinquième année du mandat en cours, sauf si celui-ci préfère réintégrer son ancienne nomination ou son ancien mandat adjoint :
  - le premier président de la cour d'appel est nommé président de chambre à la cour d'appel;
  - le premier président de la cour du travail est nommé président de chambre à la cour du travail;
  - le procureur général près la cour d'appel est désigné premier avocat général près la cour d'appel;
  - le procureur fédéral est nommé substitut du procureur général et désigné premier avocat général dans le ressort de la cour d'appel dont il est issu ;
  - le président du tribunal de première instance est nommé conseiller à la cour d'appel;
  - le président du tribunal de commerce est nommé conseiller à la cour d'appel;
  - le président du tribunal du travail est nommé conseiller à la cour du travail;
  - le président des juges de paix et des juges au tribunal de police est nommé conseiller à la cour d'appel;
  - le procureur du Roi est désigné substitut du procureur général près la cour d'appel;
  - l'auditeur du travail est désigné substitut général près la cour du travail.
  Le chef de corps sortant peut à sa demande, être à nouveau nommé par le Roi, au besoin temporairement en surnombre, à la fonction à laquelle il avait été nommé en dernier lieu avant sa désignation à la fonction de chef de corps. Le cas échéant, il réintègre également le mandat adjoint auquel il avait été désigné au stade où il a cessé de l'exercer pour autant qu'il ne s'agisse pas d'un mandat visé au § 5, alinéa 8 ou le mandat spécifique auquel il avait été désigné dans ou en dehors de la juridiction ou du parquet dans lequel il est ou était nommé au stade où il a cessé de l'exercer.
  L'alinéa 2 s'applique au chef de corps qui a obtenu la mention "insuffisant" lors de son évaluation.";
  e) le paragraphe 5 est remplacé par ce qui suit :
  " § 5. La désignation à la fonction de chef de corps d'un candidat extérieur à la juridiction ou au parquet donne lieu à une nomination simultanée, le cas échéant temporairement en surnombre, à cette juridiction ou ce parquet sans que l'article 287sexies ne soit d'application, à l'exception du procureur fédéral qui conserve sa nomination et du président des juges de paix et des juges au tribunal de police qui est le cas échéant nommé simultanément soit juge de paix dans un canton de l'arrondissement désigné par le Roi soit juge au tribunal de police de l'arrondissement. Le cas échéant, la désignation au mandat de procureur fédéral donne en outre lieu à une désignation subsidiaire simultanée, en surnombre, comme magistrat fédéral. Lorsque le magistrat désigné président des juges de paix et des juges au tribunal de police n'est ni juge de paix ni juge au tribunal de police, il est respectivement désigné juge de paix si le vice-président est juge au tribunal de police et juge au tribunal de police si le vice-président est juge de paix.
  La désignation au mandat de président du tribunal de première instance ou de procureur du Roi d'un candidat extérieur à la juridiction ou au parquet donne également lieu à une nomination en ordre subsidiaire, le cas échéant temporairement en surnombre, dans les autres tribunaux de première instance ou parquets du procureur du Roi du ressort de la cour d'appel conformément à l'article 100 et dans le respect de la loi du 15 juin 1935 concernant l'emploi des langues en matière judiciaire.
  L'alinéa 2 est également applicable aux désignations dans les tribunaux de commerce, dans les tribunaux du travail et les auditorats du travail du ressort de la Cour d'appel de Bruxelles.
  Les chefs de corps nommés juges de paix dans un canton sur la base de l'alinéa 1er sont nommés à titre subsidiaire dans les autres cantons de l'arrondissement judiciaire.
  La désignation au mandat de président du tribunal de première instance d'Eupen d'un candidat extérieur à la juridiction donne également lieu à une nomination comme juge en ordre subsidiaire temporairement en surnombre, dans le tribunal de commerce et le tribunal du travail d'Eupen conformément à l'article 100/1. La désignation au mandat de procureur du Roi d'Eupen d'un candidat extérieur au parquet donne également lieu à une nomination comme substitut en ordre subsidiaire temporairement en surnombre à l'auditorat du travail d'Eupen conformément à l'article 156.
  Les nominations à la base et les nominations à titre subsidiaire visées au présent paragraphe prennent fin lors de l'application du paragraphe 4.
  La désignation comme chef de corps suspend le mandat adjoint.
  La désignation comme chef de corps met toutefois fin au mandat de procureur du Roi adjoint de Bruxelles, d'auditeur du travail adjoint de Bruxelles, de président de division, de procureur de division, d'auditeur de division, de vice-président des juges de paix et des juges au tribunal de police.
  Les titulaires de mandat adjoint dont le mandat est suspendu peuvent le cas échéant être remplacés en surnombre pendant la durée de leur mandat de chef de corps.
  Le chef de corps peut le cas échéant être remplacé en surnombre.";
  f) un paragraphe 5/1 rédigé comme suit est inséré :
  " § 5/1. Excepté le cas où la mention "insuffisant" leur a été attribuée lors de leur évaluation, les magistrats qui ont exercé un mandat de chef de corps peuvent respectivement porter le titre de premier président honoraire, de président honoraire, de procureur général honoraire, de procureur fédéral honoraire, de procureur du Roi honoraire ou d'auditeur du travail honoraire.";
  g) au paragraphe 7, l'alinéa 2 est remplacé par ce qui suit :
  "Le chef de corps qui n'achève pas le mandat en cours réintègre d'office la fonction à laquelle il était nommé au moment de sa désignation ou, le cas échéant, le mandat adjoint auquel il avait été désigné au stade où il a cessé de l'exercer pour autant qu'il ne s'agisse pas d'un mandat de procureur du Roi adjoint de Bruxelles, d'auditeur du travail adjoint de Bruxelles, de président de division, de procureur de division, d'auditeur de division, de vice-président des juges de paix et des juges au tribunal de police ou le mandat spécifique dans ou en dehors de la juridiction ou du parquet dans lequel il est ou était nommé, auquel il avait été désigné au stade où il a cessé de l'exercer.".

  Art. 247. Dans l'article 259sexies, § 3, du même Code, inséré par la loi du 22 décembre 1998 et modifié par les lois du 21 juin 2001 et du 13 juin 2006, les modifications suivantes sont apportées :
  1° l'alinéa 2 est complété par la phrase suivante :
  "La désignation dans un des mandats visés à la première phrase met fin au mandat de procureur de division, d'auditeur de division, de procureur du Roi adjoint de Bruxelles et d'auditeur du travail adjoint de Bruxelles.";
  2° l'alinéa 3 est remplacé par ce qui suit :
  "Exceptés les mandats adjoints visés à l'alinéa 2, deuxième phrase, les mandats adjoints non définitifs sont suspendus pour la durée des mandats de magistrat de liaison en matière de jeunesse, de magistrat d'assistance et de magistrat fédéral.".

  Art. 248. A l'article 259sexies/1, alinéa 1er, du même Code, inséré par la loi du 15 juillet 2013, les mots "les magistrats du siège" sont remplacés par les mots "les magistrats du siège ou parmi les magistrats suppléants visés à l'article 156bis".

  Art. 249. Dans l'article 259septies, alinéa 3, du même Code, inséré par la loi du 17 juillet 2000 et modifié par la loi du 19 décembre 2014, les mots "et d'avocat général près la cour d'appel" sont insérés entre les mots "auditeur de division" et les mots "la désignation".

  Art. 250. L'article 259octies du même Code, inséré par la loi du 22 décembre 1998 et modifié en dernier lieu par la loi du 4 mai 2016, est remplacé par ce qui suit :
  " § 1er. Les candidats qui s'inscrivent au concours d'admission au stage judiciaire doivent, au moment de leur inscription, être licenciés ou détenteurs d'un master en droit et avoir, au cours des quatre années précédant l'inscription et à titre d'activité professionnelle principale, soit accompli un stage au barreau, soit exercé d'autres fonctions juridiques pendant au moins deux ans en tant que titulaire du diplôme de licencié ou de master en droit.
  Les candidatures au concours d'admission au stage judiciaire doivent être introduites dans un délai d'un mois après la publication de l'appel aux candidats au Moniteur belge.
  Pour chaque année judiciaire, avant le 30 avril, le Roi détermine, par arrêté délibéré en Conseil des ministres et sur avis du Collège du ministère public et du Collège des cours et tribunaux, le nombre de places vacantes de stagiaires judiciaires dans les rôles linguistiques français et néerlandais. Le Roi tient compte du nombre d'attachés judiciaires visés au § 7.
  Le ministre qui a la Justice dans ses attributions nomme les stagiaires judiciaires et désigne, sur proposition commune du Collège des cours et tribunaux et du Collège du ministère public, le ressort de la cour d'appel dans lequel le stage est accompli. Au sein de ce ressort, le procureur général affecte le stagiaire judiciaire à un parquet du procureur du Roi ou un auditorat du travail et le premier président de la cour d'appel affecte le stagiaire judiciaire à un tribunal de première instance, un tribunal de commerce ou un tribunal du travail.
  Lors de la nomination, de la désignation dans un ressort de cour d'appel et de l'affectation des stagiaires judiciaires, il est tenu compte de la priorité attachée au classement visé à l'article 259bis-9, § 1er/1, alinéa 2.
  § 2. Le stage qui donne accès à la fonction de magistrat du ministère public ou du siège a une durée de deux ans. Il comprend une formation consistant en un cycle de cours organisé par l'Institut de formation judiciaire et une formation pratique qui se déroule en plusieurs stades successifs :
  - du 1er au 11e mois, stage au sein d'un parquet du procureur du Roi et/ou de l'auditeur du travail, cette période comprenant également un mois au sein d'un service administratif d'un ou de plusieurs parquets;
  - du 12e au 14e mois, un stage externe;
  - du 15e au 24e mois, stage au sein d'une ou de plusieurs chambres du tribunal de première instance, du tribunal du travail et/ou du tribunal de commerce, cette période comprenant également un mois au sein d'un ou de plusieurs greffes.
  Le programme du stage externe est approuvé par la commission d'évaluation du stage judiciaire compétente.
  La participation aux sessions de formation organisées par l'Institut de formation judiciaire est obligatoire pour tous les stagiaires judiciaires.
  § 3. Pendant toute la durée de son stage, y compris le stage externe, le stagiaire judiciaire est placé sous l'autorité et la surveillance du chef de corps du parquet ou du siège où il effectue son stage.
  Il est également placé sous la direction de deux maîtres de stage chargés de sa formation qui sont assistés par l'Institut de formation judiciaire dans l'élaboration et le suivi du programme de stage. Le premier est magistrat du parquet du procureur du Roi ou de l'auditeur du travail. Le second est magistrat du siège au tribunal de première instance, tribunal du travail ou tribunal de commerce. Ils sont désignés par leur chef de corps respectif parmi les magistrats qui ont suivi la formation spécialisée organisée par l'Institut de formation judiciaire. Cette formation est organisée au moins tous les deux ans.
  Avant la fin du 9e mois du stage, le stagiaire soumet une proposition motivée relative au stage externe à l'approbation de la commission d'évaluation du stage judiciaire compétente.
  Le premier maître de stage transmet à la commission d'évaluation du stage judiciaire compétente, au cours du 12e mois de stage, un rapport circonstancié sur le déroulement de la première partie du stage et, au cours du 15e mois de stage, un rapport circonstancié sur le déroulement du stage externe. Il communique une copie de ces rapports au procureur du Roi et/ou à l'auditeur du travail du parquet ou de l'auditorat où le stagiaire a été affecté, ainsi qu'au procureur général concerné.
  Au cours du 21e mois, le second maître de stage transmet à la commission d'évaluation du stage judiciaire compétente un rapport circonstancié sur le déroulement de la troisième partie de celui-ci et en communique une copie au président du tribunal de première instance, du tribunal du travail et/ou du tribunal de commerce où le stagiaire a été affecté, ainsi qu'au premier président de la cour d'appel concernée. Si nécessaire, le maître de stage fait parvenir, de la même manière, un rapport complémentaire relatif aux trois derniers mois de stage.
  Avant la fin du 22e mois de stage, la commission d'évaluation du stage judiciaire compétente fait parvenir le rapport final circonstancié et les rapports rédigés par les maîtres de stage au ministre qui a la Justice dans ses attributions et communique une copie du rapport final aux chefs de corps du parquet et de la juridiction où le stagiaire a été affecté, ainsi qu'au procureur général et au premier président de la cour d'appel concernés.
  Le stagiaire judiciaire reçoit une copie des rapports de stage dans les mêmes délais. Si les informations contenues dans un ou plusieurs rapports sont défavorables, la commission d'évaluation du stage judiciaire compétente rend un avis après avoir entendu l'intéressé. L'accomplissement de cette formalité est mentionné dans le rapport communiqué au ministre qui a la Justice dans ses attributions.
  Si le rapport final est favorable et si le stagiaire a accompli toutes les obligations du stage, le directeur de l'Institut de formation judiciaire délivre au stagiaire, au cours du 22e mois de stage, un certificat attestant qu'il a achevé avec fruit le stage judiciaire et en adresse une copie au ministre qui a la Justice dans ses attributions. Le certificat est, cependant, retiré si le stagiaire commet une faute grave durant les deux derniers mois de stage.
  § 4. Le ministre qui a la Justice dans ses attributions ou son délégué peut, après avoir entendu l'intéressé et sur l'avis motivé du chef de corps du parquet ou de la juridiction où le stagiaire effectue son stage et de la commission d'évaluation du stage judiciaire compétente, mettre fin au stage de manière anticipative pour cause d'inaptitude professionnelle moyennant un préavis de trois mois. Le délai de préavis prend cours à l'expiration du mois civil pendant lequel le préavis est notifié à l'intéressé.
  Le ministre qui a la Justice dans ses attributions ou son délégué peut également mettre fin au stage de manière anticipative pour faute grave, sans préavis, après avoir entendu l'intéressé et sur l'avis motivé du chef de corps du parquet ou de la juridiction où le stagiaire effectue son stage et de la commission d'évaluation du stage judiciaire compétente.
  Dans les cas visés aux alinéas 1er et 2, l'intéressé est soumis aux articles 7 à 13 de la loi du 20 juillet 1991 portant des dispositions sociales et diverses.
  Le stage peut être suspendu pour des motifs légitimes par le ministre qui a la Justice dans ses attributions ou son délégué, soit d'office après avis du chef de corps concerné, soit à la demande de l'intéressé.
  En cas de suspension ou d'absence ininterrompue pendant plus d'un mois, le stage est prolongé de plein droit de la même durée sans que cette prolongation puisse dépasser huit mois.
  Les alinéas 4 et 5 ne sont pas applicables aux congés liés à la protection de la maternité visés à l'article 39 de la loi du 16 mars 1971 sur le travail, lesquels sont assimilés à des périodes de stage.
  § 5. Les stagiaires judiciaires nommés conformément au § 1er sont appelés en service en cette qualité après avoir prêté le serment prévu à l'article 2 du décret du 20 juillet 1831 concernant le serment.
  Le stagiaire n'a pas la qualité de magistrat.
  Le stagiaire a, pour la durée du stage au parquet du procureur du Roi ou pour la durée du stage au parquet de l'auditeur du travail, la qualité d'officier de police judiciaire, auxiliaire respectivement du procureur du Roi ou de l'auditeur du travail, mais il ne peut en exercer les fonctions que sur commissionnement par le procureur général.
  Après six mois de stage, il peut être commissionné par le procureur général pour exercer en tout ou en partie les fonctions du ministère public pour la seule durée du stage au parquet du procureur du Roi et/ou de l'auditeur du travail.
  Pendant la durée du stage au siège, le stagiaire peut être assumé en qualité de greffier, conformément à l'article 329. Pendant cette même période, le stagiaire judiciaire assiste le ou les juges composant la chambre du tribunal au sein duquel il est affecté. Il assiste au délibéré, mais n'exerce aucune suppléance.
  Ces affectations sont portées à la connaissance des maîtres de stage visés au § 3, ainsi que des chefs de corps respectifs.
  Les fonctions de stagiaire judiciaire sont incompatibles avec toute autre fonction rémunérée. Le ministre qui a la Justice dans ses attributions ou son délégué peut toutefois, sur avis du maître de stage concerné, autoriser l'intéressé à exercer les fonctions visées à l'article 294, alinéa 1er.
  § 6. Le stagiaire judiciaire perçoit :
  1° une rémunération payée à terme échu, calculée dans l'échelle de traitement NA 11 qui est accordée au personnel de la fonction publique fédérale;
  2° les augmentations intercalaires prévues dans ladite échelle;
  3° les allocations, indemnités et rétributions complémentaires de traitement attribuées au personnel des services publics fédéraux, dans la même mesure et aux mêmes conditions que celles imposées à celui-ci;
  4° une prime forfaitaire de 138 euros par service de garde de nuit, ou pendant les week-ends ou les jours fériés, réellement assumé au sein d'un parquet du procureur du Roi, pour autant qu'il soit inscrit au rôle de garde. Par service de garde, on entend un service continu de douze heures pendant lequel les intéressés sont joignables et disponibles mais peuvent également se déplacer afin d'assurer des prestations sur un lieu de travail. Le montant maximum des primes pour la période de stage légale au parquet ne peut être supérieur à 1 242 euros.
  Lors de la nomination au stage, le traitement est fixé en prenant uniquement en considération deux années au titre de l'expérience exigée, conformément au § 1er, alinéa 1er, comme condition de participation au concours d'admission au stage.
  Le régime de mobilité applicable aux traitements du personnel s'applique également à la rémunération du stagiaire ainsi qu'à la prime de garde. Elles sont rattachées à l'indice-pivot 138,01.
  Toute la législation concernant la sécurité sociale des stagiaires de la fonction publique est applicable au stagiaire judiciaire.
  Le Roi détermine l'assistance en justice des stagiaires judiciaires et l'indemnisation des dommages aux biens, encourus par eux, conformément aux dispositions en vigueur pour les agents de l'Etat.
  § 7. Si le stage est achevé avec fruit, lorsque la nomination du stagiaire ne peut avoir lieu à la fin du 24e mois, le Roi nomme d'office le stagiaire en qualité d'attaché judiciaire, selon le cas, auprès des cours et tribunaux ou auprès du ministère public.
  A cette fin, les stagiaires judiciaires font connaître, avant la fin du 21e mois de leur stage, par voie électronique au ministre qui a la Justice dans ses attributions, leur préférence entre le parquet et le siège pour l'exercice éventuel de la fonction d'attaché judiciaire à l'issue de leur stage.
  Le ministre qui a la Justice dans ses attributions ou son délégué désigne en fonction des nécessités du service et, si possible, sur la base de la préférence de l'attaché judiciaire, le tribunal ou le parquet dans lequel celui-ci exercera ses fonctions. Les nécessités du service sont établies sur avis du Collège des cours et tribunaux et du Collège du ministère public.
  Chaque année, le Collège des cours et tribunaux et le Collège du ministère public adressent au ministre qui a la Justice dans ses attributions un rapport concernant la situation des attachés judiciaires auprès des cours et tribunaux et auprès du ministère public ainsi que l'évaluation du passage vers la magistrature au cours de l'année judiciaire écoulée. Ce rapport est transmis à la Chambre des représentants.
  L'attaché judiciaire auprès du parquet a la qualité d'officier de police judiciaire, auxiliaire respectivement du procureur du Roi ou de l'auditeur du travail, mais il ne peut en exercer les fonctions que sur commissionnement par le procureur général. Il peut être commissionné par le procureur général pour exercer en tout ou en partie les fonctions du ministère public sous la surveillance du chef de corps du parquet auquel il est attaché.
  L'attaché judiciaire auprès des cours et tribunaux est placé sous la surveillance du chef de corps de la juridiction à laquelle il est attaché. Il peut être assumé en qualité de greffier, conformément à l'article 329. Il assiste le ou les juges composant la chambre du tribunal au sein duquel il est affecté. Il assiste au délibéré et peut exercer une suppléance.
  § 8. Le statut des référendaires et juristes de parquet est applicable aux attachés judiciaires sous réserve de ce qui suit :
  1° l'attaché judiciaire perçoit une rémunération payée à terme échu qui correspond à une fonction de la classe A1;
  2° pour l'application de l'article 372bis, la durée du stage judiciaire compte comme ancienneté d'échelle et l'attaché judiciaire est considéré comme ayant d'office reçu à deux reprises la mention "répond aux attentes";
  3° l'attaché judiciaire est dispensé de la période de stage précédent la nomination;
  4° l'attaché judiciaire perçoit une prime forfaitaire de 138 euros par service de garde de nuit, ou pendant les week-ends ou les jours fériés, réellement assumé au sein d'un parquet du procureur du Roi, pour autant qu'il soit inscrit au rôle de garde. Par service de garde, on entend un service continu de douze heures pendant lequel les intéressés sont joignables et disponibles mais peuvent également se déplacer afin d'assurer des prestations sur un lieu de travail. Le nombre de gardes effectuées par an ne peut être supérieur à 18.
  Le régime de mobilité applicable aux traitements du personnel s'applique également à la rémunération de l'attaché judiciaire, ainsi qu'à la prime de garde. Elles sont rattachées à l'indice-pivot 138,01.".

  Art. 251. Dans l'article 263, § 2, du même Code, remplacé par la loi du 25 avril 2007 et modifié par les lois des 10 avril 2014 et 4 mai 2016, le 1° est remplacé par ce qui suit :
  "1° être nommé à titre définitif dans une fonction du niveau A ou un grade du niveau B et posséder, selon le cas, une ancienneté de classe ou une ancienneté de grade d'au moins 2 ans s'il est titulaire d'un diplôme ou certificat d'études visé au § 1er, ou d'au moins 5 ans s'il n'est pas titulaire d'un tel diplôme ou certificat d'études;".

  Art. 252. Dans l'article 266, § 2, du même Code, remplacé par la loi du 25 avril 2007 et modifié par les lois des 10 avril 2014 et 4 mai 2016, le 1° est remplacé par ce qui suit :
  "1° être nommé à titre définitif dans une fonction du niveau A ou un grade du niveau B et posséder, selon le cas, une ancienneté de classe ou une ancienneté de grade d'au moins 2 ans s'il est titulaire d'un diplôme ou certificat d'études visé au § 1er, ou d'au moins 5 ans s'il n'est pas titulaire d'un tel diplôme ou certificat d'études;".

  Art. 253. L'article 274, § 4, alinéa 1er, du même Code, remplacé par la loi du 25 avril 2007 et modifié par la loi du 4 mai 2016, est complété par les phrases suivantes :
  "L'épreuve comparative complémentaire peut consister en plusieurs parties successives, le candidat ne pouvant prendre part à la partie suivante que s'il a réussi la partie précédente. Dans ce cas, le classement est établi sur la base des résultats de la dernière partie, qui comprend au moins un entretien.".

  Art. 254. Dans l'article 276 du même Code, remplacé par la loi du 25 avril 2007 et modifié par la loi du 10 avril 2014, le paragraphe 2 est rétabli comme suit :
  " § 2. Pour obtenir une promotion ou une promotion barémique, le membre du personnel doit être dans une position administrative où il peut faire valoir ses titres à la promotion. En outre, il ne peut avoir obtenu la mention "à améliorer" ou "insuffisant" au terme de son évaluation.".

  Art. 255. Dans l'article 287quater, § 2, du même Code, remplacé par la loi du 10 avril 2014 et modifié par la loi du 4 mai 2016, les mots "L'avis motivé de la commission" sont remplacés par les mots "Sans préjudice de l'article 287ter, § 4ter, applicable au stagiaire, l'avis motivé de la commission".

  Art. 256. A l'article 288 du même Code, modifié en dernier lieu par la loi du 4 mai 2016, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans l'alinéa 5, les mots "des attachés judiciaires près les tribunaux de première instance, les tribunaux de commerce et les parquets des procureurs du Roi," sont insérés entre les mots "de leurs substituts," et les mots "des référendaires";
  2° dans l'alinéa 6, les mots "des attachés judiciaires près les tribunaux du travail et les parquets des auditeurs du travail," sont insérés entre les mots "de leurs substituts," et les mots "des référendaires".

  Art. 257. Dans l'article 291, alinéa 1er, du même Code, modifié en dernier lieu par la loi du 4 mai 2016, les mots "des attachés judiciaires près ces tribunaux et ces parquets," sont insérés entre les mots "de leurs substituts," et les mots "des greffiers près ces tribunaux,".

  Art. 258. Dans l'article 321, alinéa 2, deuxième phrase du même Code, inséré par la loi du 9 juillet 1997, les mots "Le conseiller suppléant ne peut pas" sont remplacés, par les mots "A l'exception du magistrat suppléant visé à l'article 156bis, le conseiller suppléant ne peut".

  Art. 259. Dans l'article 323bis, § 1er, du même Code, inséré par la loi du 22 décembre 1998 et modifié en dernier lieu par la loi du 29 juin 2016, les modifications suivantes sont apportées :
  1° l'alinéa 4 est remplacé par ce qui suit :
  "L'exercice d'une mission met fin au mandat adjoint de président de division, de vice-président des juges de paix et des juges au tribunal de police, de procureur de division, d'auditeur de division, de procureur du Roi adjoint de Bruxelles ou d'auditeur du travail adjoint de Bruxelles. L'exercice des autres mandats adjoints dont les titulaires ne sont pas désignés à titre définitif est suspendu pour la durée de la mission. Ils conservent leur place sur la liste de rang et son censés avoir exercé la fonction à laquelle ils étaient nommés et le mandat adjoint pour lequel ils étaient désignés. Ils conservent le traitement ou le supplément de traitement afférent au mandat adjoint, ainsi que les augmentations et avantages y afférents pour autant qu'aucun traitement ne soit attaché à la mission. Si la mission est une mission à temps partiel à laquelle un traitement est attaché, ils conservent au prorata le traitement ou le supplément de traitement afférent au mandat adjoint ainsi que les augmentations et les avantages y afférents. Ils reçoivent d'office la mention "bon" pendant la durée de leur mission.".
  2° dans l'alinéa 6, les mots " § 4 ou § 5, alinéa 3" sont remplacés par les mots " § 7, alinéa 2".

  Art. 260. L'article 372bis, alinéa 1er, 2°, du même Code, inséré par la loi du 10 avril 2014, est complété par la phrase suivante :
  "La mention obtenue à l'issue de la période d'évaluation qui suit immédiatement l'attribution de la mention "insuffisant" n'entre, toutefois, pas en ligne de compte pour l'appréciation de cette condition.".

  Art. 261. L'article 372ter, alinéa 1er, 2°, du même Code, inséré par la loi du 10 avril 2014, est complété par la phrase suivante :
  "La mention obtenue à l'issue de la période d'évaluation qui suit immédiatement l'attribution de la mention "insuffisant" n'entre, toutefois, pas en ligne de compte pour l'appréciation de cette condition.".

  Art. 262. L'article 372quater, alinéa 1er, 2°, du même Code, inséré par la loi du 10 avril 2014, est complété par la phrase suivante :
  "La mention obtenue à l'issue de la période d'évaluation qui suit immédiatement l'attribution de la mention "insuffisant" n'entre, toutefois, pas en ligne de compte pour l'appréciation de cette condition.".

  Art. 263. L'article 375, § 5, du même Code, inséré par la loi du 10 avril 2014, est remplacé par ce qui suit :
  " § 5. Le membre du personnel est promu à l'échelle de traitement supérieure ou bénéficie des bonifications d'échelle dans le grade ou la classe où il est nommé comme s'il y avait obtenu annuellement la mention "répond aux attentes", même s'il a obtenu la mention "à améliorer" ou "insuffisant" dans le cadre de l'exercice d'une fonction supérieure. La mention "à améliorer" ou "insuffisant" met, cependant, fin d'office à la désignation à une fonction supérieure.
  Par dérogation à l'alinéa 1er, le membre du personnel obtient la mention "exceptionnel" dans la fonction de la classe ou du niveau où il est nommé, lorsqu'il obtient la mention "exceptionnel" dans la fonction liée à l'exercice de la fonction supérieure.".

  Art. 264. Dans l'article 383 du même Code, remplacé par la loi du 17 juillet 1984 et modifié en dernier lieu par la loi du 19 octobre 2015, les modifications suivantes sont apportées :
  a) le paragraphe 3 est rétabli dans la rédaction suivante :
  " § 3. En ce qui concerne les juges de paix et les juges au tribunal de police nommés dans l'arrondissement judiciaire de Bruxelles, la désignation est faite par le président du tribunal de première instance francophone ou néerlandophone en fonction de la langue du diplôme de licencié, de docteur ou de master en droit dont ils sont porteurs. Dans l'arrondissement judiciaire d'Eupen la désignation des juges de paix et des juges au tribunal de police est faite par le président du tribunal de première instance.";
  b) l'article est complété par un paragraphe 4 rédigé comme suit :
  " § 4. Les juges de paix désignés pour exercer des fonctions de magistrat suppléant peuvent également exercer cette fonction dans un autre canton de l'arrondissement judiciaire.".

  Art. 265. Dans l'article 398 du même Code, modifié par les lois du 4 mars 1997, 19 juillet 2012 et du 10 avril 2014, l'alinéa 1er est remplacé comme suit :
  "Sans préjudice de l'application des articles 143bis et 143quater, la Cour de cassation a un droit de surveillance sur les cours d'appel et les cours du travail, les cours d'appel ont un droit de surveillance sur les tribunaux de première instance, les tribunaux de commerce, les justices de paix et les tribunaux de police de leur ressort, et les cours du travail sur les tribunaux du travail de leur ressort.".

  Art. 266. Dans l'article 409, § 1er, alinéa 4, du même Code, remplacé par la loi du 15 juillet 2013, les mots "au greffe du tribunal de première instance de Namur ou de Gand" sont remplacés par les mots "au greffe de la division de Namur du tribunal de première instance de Namur, ou de la division de Gand du tribunal de première instance de Flandre orientale".

  Art. 267. Dans le texte néerlandais de l'article 413, § 6, alinéa 2, du même Code, remplacé par la loi du 15 juillet 2013, les mots "brengt de in artikel 412, § 1, bedoelde tuchtrechtbank de overheid" sont remplacés par les mots "brengt de tuchtrechtbank de in artikel 412, § 1, bedoelde overheid".

  Art. 268. Dans l'article 423 du même Code, remplacé par la loi du 15 juillet 2013, les mots "au Conseil supérieur de la Justice, à la Chambre des représentants et au Sénat" sont remplacés par les mots "avant le 1er avril de chaque année au Conseil supérieur de la Justice, à la Chambre des représentants et au ministre qui a la Justice dans ses attributions".

  Art. 269. Dans l'article 430.3, alinéa 1er, du même Code, remplacé par la loi du 22 novembre 2001, les mots "et 195" sont remplacés par les mots "195 et 210".

  Art. 270. L'article 1727, § 2, alinéa 7 et § 4, alinéa 7, du même Code, inséré par la loi du 21 février 2005, est à chaque fois complété par la phrase suivante : "Les membres sortants poursuivent leur mandat jusqu'à la désignation des nouveaux membres.".

  CHAPITRE 2. - Modifications de la loi du 31 janvier 2007 sur la formation judiciaire et portant création de l'Institut de formation judiciaire

  Art. 271. L'intitulé de la loi du 31 janvier 2007 sur la formation judiciaire et portant création de l'Institut de formation judiciaire est remplacé par ce qui suit :
  "Loi sur la formation judiciaire et la gestion des connaissances et portant création de l'Institut de formation judiciaire".

  Art. 272. L'intitulé du chapitre II de la même loi est remplacé par l'intitulé suivant :
  "CHAPITRE II. - Du champ d'application et des définitions".

  Art. 273. L'article 3 de la même loi est placé dans le chapitre II et est complété par un alinéa rédigé comme suit :
  "On entend par gestion des connaissances :
  1° le développement, la gestion et la diffusion auprès des personnes visées à l'article 2, de contenus audiovisuels, de documentations et d'informations en faveur de l'ordre judiciaire;
  2° le développement et la gestion de bases de données et de bibliothèques;
  3° la coordination et l'organisation de recherches scientifiques en faveur de l'ordre judiciaire.".

  Art. 274. L'article 7, alinéa 2, de la même loi, modifié par la loi du 24 juillet 2008, est complété par les mots ", ainsi que des membres du personnel ou des collaborateurs d'autres juridictions ou services qui collaborent avec les juridictions. Les lauréats de l'examen d'aptitude professionnelle et de l'examen oral d'évaluation, durant la période où ils conservent l'avantage de leur réussite, peuvent être autorisés par l'Institut à participer aux formations dont il fixe la liste.".

  Art. 275. Dans le chapitre IV, section 2, de la même loi, il est inséré un article 8/1, rédigé comme suit :
  "Art. 8/1. § 1er. L'Institut a la compétence de développer, d'organiser, de coordonner et de gérer des projets en matière de gestion des connaissances.
  § 2. Le ministre qui a la Justice dans ses attributions, le Collège des cours et tribunaux, le Collège du ministère public et l'entité de gestion qui réunit la Cour de cassation et le parquet près cette Cour peuvent mandater l'Institut pour soutenir, développer et gérer, en leur nom, des projets relatifs à la gestion des connaissances.
  § 3. En vue de la gestion des connaissances et/ou d'éventuels partenariats en la matière, des comités de gestion peuvent être créés sous les auspices de l'Institut afin d'assurer le suivi et la gestion de ces activités. Les compétences, la composition et le fonctionnement de ces comités de gestion sont déterminés par le Roi après avis de la direction et ils ne peuvent entrer en fonction qu'après approbation du conseil d'administration de l'Institut.".

  Art. 276. Dans l'article 11 de la même loi, modifié par les lois du 25 avril 2014 et du 4 mai 2016, les modifications suivantes sont apportées :
  a) le paragraphe 1er est remplacé par ce qui suit :
  " § 1er. Le conseil d'administration se compose de quatorze membres, également répartis entre les rôles linguistiques francophone et néerlandophone.
  Sont membres de plein droit du conseil d'administration de l'Institut :
  1° le directeur de l'Institut de formation judiciaire ou le directeur adjoint en cas d'empêchement de celui-ci;
  2° un représentant du ministre qui a la Justice dans ses attributions;
  3° les présidents des commissions de nomination et de désignation du Conseil supérieur de la Justice;
  4° les fonctionnaires dirigeants des départements enseignement respectifs de la Communauté française, de la Communauté flamande et de la Communauté germanophone, ce dernier relevant du rôle linguistique francophone.
  Sont désignés :
  1° deux magistrats du siège désignés par le Collège des cours et tribunaux et deux magistrats du ministère public désignés par le Collège du ministère public;
  2° deux personnes parmi celles visées à l'article 2, 4° à 10°, dont une personne désignée par le Collège des cours et tribunaux et une personne désignée par le Collège du ministère public;
  3° un magistrat désigné par l'entité de gestion qui réunit la Cour de cassation et le parquet près cette Cour.
  La durée des mandats visés à l'alinéa 3 est de 5 ans. Ils sont renouvelables une fois.";
  b) dans le texte néerlandais du paragraphe 2, deuxième phrase, les mots "dat wordt goedgekeurd bij koninklijk besluit" sont abrogés.

  Art. 277. L'article 26, alinéa 1er, de la même loi, modifié par la loi du 25 avril 2014, est complété par les 5° et 6° rédigés comme suit :
  "5° la gestion des connaissances;
  6° d'autres tâches de consultance relatives aux activités de formation et de gestion des connaissances de l'Institut, qui sont désignées par le conseil d'administration.".

  Art. 278. Dans l'article 27 de la même loi, remplacé par la loi du 25 avril 2014 et modifié par la loi du 4 mai 2016, les modifications suivantes sont apportées :
  a) dans l'alinéa 1er, le mot "vingt-deux" est remplacé par le mot "vingt-quatre";
  b) dans l'alinéa 3, 2°, les mots "le Collège des procureurs généraux" sont remplacés par les mots "le Collège du ministère public";
  c) l'alinéa 3 est complété par les 7° et 8° rédigés comme suit :
  "7° un membre de l'entité de gestion qui réunit la Cour de cassation et le parquet près cette Cour;
  8° un membre de la Bibliothèque royale de Belgique appartenant à un rôle linguistique différent de celui du membre de l'entité de gestion qui réunit la Cour de cassation et le parquet près cette Cour.";
  d) dans l'alinéa 4, les mots "et au plus tard jusqu'à la fin de leur stage judiciaire" sont insérés entre les mots "d'un an" et les mots " : deux stagiaires judiciaires,".

  Art. 279. A l'article 42 de la même loi, les modifications suivantes sont apportées :
  a) dans l'alinéa 2, 1°, les mots "et § 3, alinéa 2, 2e tiret" sont abrogés;
  b) l'alinéa 2 est complété par un 7°, un 8° et un 9° rédigés comme suit :
  "7° de veiller au respect des obligations du stage et au bon déroulement de celui-ci;
  8° d'assister les maîtres de stage de leurs conseils;
  9° de conseiller la direction de l'Institut relativement à l'organisation de la formation dispensée par celui-ci aux stagiaires judiciaires conformément à l'article 259octies, § 2, du Code judiciaire.".

  Art. 280. A l'article 43 de la même loi, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans l'alinéa 1er, le 3e tiret est remplacé comme suit :
  "- du directeur de l'Institut de formation ou de son représentant;";
  2° dans l'alinéa 2, les mots "directeur adjoint de l'Institut de formation, compétent pour la division des magistrats de l'ordre judiciaire et des stagiaires judiciaires, ou de son représentant, " sont remplacés par les mots "directeur de l'Institution de formation ou son représentant";
  3° dans les alinéas 3 et 6, les mots "directeur adjoint de l'Institut de formation, compétent pour la division des magistrats de l'ordre judiciaire et les stagiaires judiciaires," sont remplacés par les mots "directeur de l'Institut de formation";
  4° l'article est complété par un alinéa rédigé comme suit :
  "Chaque commission peut déléguer un ou plusieurs de ses membres pour accomplir, sous son autorité, les missions visées à l'article 42, alinéa 2, 7° et 8°. ".

  CHAPITRE 3. - Modifications de la loi du 10 avril 2014 modifiant certaines dispositions du Code judiciaire en vue d'instaurer une nouvelle carrière pécuniaire pour le personnel judiciaire ainsi qu'un système de mandats pour les greffiers en chef et les secrétaires en chef

  Art. 281. Dans l'article 41 de la loi du 10 avril 2014 modifiant certaines dispositions du Code judiciaire en vue d'instaurer une nouvelle carrière pécuniaire pour le personnel judiciaire ainsi qu'un système de mandats pour les greffiers en chef et les secrétaires en chef, le paragraphe 1er est remplacé par ce qui suit :
  " § 1er. Les membres du personnel qui, au moment de l'entrée en vigueur de la présente loi, sont nommés à titre définitif dans une fonction de greffier en chef rangée dans la classe A3 conformément à l'article 72, sont réputés remplir les conditions visées à l'article 262, § 3, alinéa 1er, 1° et 2°, et à l'article 265, § 3, alinéa 1er, 1° et 2°, du Code judiciaire.
  Les membres du personnel qui, au moment de l'entrée en vigueur de la présente loi, sont nommés à titre définitif dans une fonction de greffier et comptent une ancienneté de classe ou une ancienneté de grade de 10 ans au moins sont réputés remplir les conditions visées à l'article 262, § 3, alinéa 1er, 1° et 2°, du Code judiciaire, pour autant qu'au moment de l'entrée en vigueur de la présente loi, ils soient lauréats d'une sélection comparative de promotion à la classe A3 visée à l'article 262, § 2, du Code judiciaire et pour autant que la durée de validité de ladite sélection n'ait pas expiré.
  Les membres du personnel qui, au moment de l'entrée en vigueur de la présente loi, sont nommés à titre définitif dans une fonction de secrétaire en chef rangée dans la classe A3 conformément à l'article 72 sont réputés remplir les conditions visées à l'article 262, § 3, alinéa 1er, 1° et 2°, et à l'article 265, § 3, alinéa 1er, 1° et 2°, du Code judiciaire.
  Les membres du personnel qui, au moment de l'entrée en vigueur de la présente loi, sont nommés à titre définitif dans une fonction de secrétaire et comptent une ancienneté de classe ou une ancienneté de grade de 10 ans au moins sont réputés remplir les conditions visées à l'article 262, § 3, alinéa 1er, 1° et 2°, du Code judiciaire, pour autant qu'au moment de l'entrée en vigueur de la présente loi, ils soient lauréats d'une sélection comparative de promotion à la classe A3 visée à l'article 262, § 2, du Code judiciaire et pour autant que la durée de validité de ladite sélection n'ait pas expiré.".

  Art. 282. L'article 50, alinéa 2, de la même loi est complété par la phrase suivante :
  "La mention obtenue à l'issue de la période d'évaluation qui suit immédiatement l'attribution de la mention "insuffisant" n'entre, toutefois, pas en ligne de compte pour l'appréciation de cette condition.".

  Art. 283. Dans l'article 51 de la même loi, les mots "acquise depuis le 1er juillet 2014" sont insérés entre les mots "ancienneté pécuniaire" et les mots "s'il a obtenu".

  Art. 284. Dans l'article 53 de la même loi, les paragraphes 1er et 2, alinéa 2, sont chaque fois complétés par la phrase suivante :
  "La mention obtenue à l'issue de la période d'évaluation qui suit immédiatement l'attribution de la mention "insuffisant" n'entre, toutefois, pas en ligne de compte.".

  Art. 285. Dans l'article 63 de la même loi, modifié par la loi du 4 mai 2016, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans l'alinéa 1er, les mots "nommé ultérieurement à titre provisoire" sont remplacés par les mots "nommé ultérieurement stagiaire";
  2° l'alinéa 4 est remplacé par ce qui suit :
  "L'ancienneté pécuniaire qu'il a obtenue soit entre le 1er juillet 2014 et la date à laquelle il obtient la première bonification d'échelle, soit depuis le mois où il a bénéficié de sa dernière bonification d'échelle est valorisée comme ancienneté d'échelle. Les mentions obtenues durant la période d'ancienneté pécuniaire valorisée sont conservées.";
  3° l'alinéa 5 est complété par les mots "ainsi qu'au membre du personnel qui est de nouveau admis au stage sans interruption.";
  4° l'article est complété par l'alinéa suivant :
  "Par dérogation aux articles 372bis et 372ter du Code judiciaire et à l'article 64 de l'arrêté royal du 10 novembre 2006 portant statut, carrière et statut pécuniaire du personnel judiciaire, le membre du personnel qui est contractuel à l'entrée en vigueur de la présente loi et qui est admis en stage dans le même grade ou la même classe obtient le passage à l'échelle de traitement supérieure au plus tôt à l'expiration de la durée effective de son stage.".

  Art. 286. Dans l'article 69 de la même loi, l'alinéa 1er est complété par ce qui suit :
  "L'ancienneté pécuniaire obtenue entre le 1er juillet 2014 et la date à laquelle le membre du personnel obtient la première bonification d'échelle, ou celle obtenue depuis le mois où il a bénéficié de sa dernière bonification d'échelle, est valorisée comme ancienneté d'échelle. Les mentions obtenues durant la période d'ancienneté pécuniaire valorisée sont conservées.".

  Art. 287. L'article 70 de la même loi est complété par un alinéa rédigé comme suit :
  "Pour l'application de l'alinéa 1er, il n'est pas tenu compte de la diminution de la première bonification d'échelle visée à l'article 52.".

  Art. 288. A l'article 73 de la même loi, les modifications suivantes sont apportées :
  1° les mots " § 5" sont abrogés;
  2° dans le texte néerlandais, les mots "259quater, § 2, lid 3" sont remplacés par les mots "259quater, § 2, derde lid, d".

  CHAPITRE 4. - Dispositions transitoires

  Art. 289. § 1er. Les chefs de corps désignés au moment de l'entrée en vigueur de l'article 246 peuvent bénéficier de la nomination visée à l'article 259quater, § 4, nouveau du Code judiciaire à la fin de leur deuxième mandat pour autant qu'ils aient obtenu la mention "bon" lors de l'évaluation et que selon le cas :
  - le Conseil supérieur de la Justice présente au Roi le président du tribunal ou le président des juges de paix et des juges au tribunal de police en vue de sa nomination comme conseiller à la cour d'appel ou à la cour du travail;
  - le Conseil supérieur de la Justice présente au Roi le procureur fédéral en vue de sa nomination comme substitut du procureur général;
  - le Conseil supérieur de la Justice présente au Roi le procureur du Roi en vue de sa nomination comme substitut du procureur général;
  - le Conseil supérieur de la Justice présente au Roi l'auditeur du travail en vue d'une nomination comme substitut général;
  Ils adressent à cette fin une demande au ministre de la Justice au plus tard à la fin du 52e mois d'exercice du mandat.
  § 2. Lorsque le chef de corps sortant demande à être nommé conseiller, substitut du procureur général ou substitut général, le ministre de la Justice demande au plus tard 135 jours avant la date de fin du mandat en cours l'avis écrit selon le cas :
  - du premier président de la cour et de l'assemblée générale de la cour;
  - du procureur général près la cour d'appel.
  Ces avis sont transmis dans les 60 jours suivant la demande d'avis par envoi électronique au ministre de la Justice.
  Le chef de corps dispose de 15 jours pour transmettre ses observations par envoi électronique au ministre de la Justice.
  L'avis ou les avis, les éventuelles observations du chef de corps, les pièces prouvant la réception de ces avis par le chef de corps et la mention obtenue dans le cadre de l'évaluation sont transmis au Conseil supérieur de la Justice au plus tard 60 jours avant la date d'échéance du mandat.
  La présentation par la commission de nomination et de désignation du Conseil supérieur de la Justice prend la forme d'une décision d'acceptation ou d'un refus de présentation. Elle est transmise au plus tard 30 jours avant l'expiration du mandat.
  Le Roi dispose d'un délai de 30 jours pour prendre une décision et communiquer celle-ci au magistrat concerné, au chef de corps de la cour ou du parquet général ou de l'auditorat général dans lequel la nomination a été demandée.
  § 3. Excepté le cas du procureur fédéral pour lequel cette désignation est liée à la nomination par le Roi comme substitut du procureur général, la désignation dans un mandat adjoint de président de chambre ou de premier avocat général a lieu d'office, par dérogation à l'article 259quinquies du Code judiciaire.

  Art. 290. Les dispositions relatives au stage judiciaire qui s'appliquaient avant l'entrée en vigueur de la présente loi demeurent applicables aux personnes qui ont entrepris ou accompli leur stage judiciaire avant l'entrée en vigueur de la présente loi. L'ancien article 191 du Code judiciaire continue à s'appliquer aux personnes qui effectuent ou qui ont accompli le stage visé à l'article 259octies, § 3, ancien du Code judiciaire au moment de l'entrée en vigueur de la présente loi.
  Toutefois, les personnes qui, au moment de l'entrée en vigueur de la présente loi, effectuent le stage judiciaire visé à l'article 259octies, § 3, ancien du Code judiciaire, en vue d'exercer la fonction de magistrat du ministère public, se verront délivrer un certificat sur la base duquel ils pourront se porter candidat à une nomination comme substitut du procureur du Roi ou de l'auditeur du travail pour autant que la commission d'évaluation compétente ait fait parvenir au directeur de l'Institut de formation judiciaire un rapport final circonstancié favorable avant la fin du 15e mois de stage.
  Les personnes qui, au moment de l'entrée en vigueur de la présente loi, effectuent le stage judiciaire visé à l'article 259octies, § 2, ancien du Code judiciaire, en vue d'exercer la fonction de magistrat du siège ou du ministère public, se verront délivrer le certificat visé à l'article 259octies, § 3, alinéa 8, du Code judiciaire, tel que modifié par la présente loi, pour autant que la commission d'évaluation compétente ait fait parvenir au directeur de l'Institut de formation judiciaire un rapport final circonstancié favorable avant la fin du 33ème mois de stage.
  A l'exception de ceux qui ont obtenu une mention finale défavorable, les stagiaires judiciaires qui, au moment de l'entrée en vigueur de la présente loi, ont accompli le stage de trois ans qui donne accès à la fonction de magistrat du siège ou de magistrat du ministère public sont réputés détenir le certificat visé à l'article 259octies, § 3, alinéa 8, du Code judiciaire, tel que modifié par la présente loi.
  A l'exception de ceux qui ont obtenu une mention finale défavorable, les stagiaires judiciaires qui, au moment de l'entrée en vigueur de la présente loi, ont accompli le stage de dix-huit mois qui donne accès à la fonction de magistrat du ministère public sont réputés détenir un certificat sur la base duquel ils pourront se porter candidat à une nomination comme substitut du procureur du Roi ou de l'auditeur du travail.
  Sans préjudice de l'alinéa 1er, les stagiaires qui, au moment de l'entrée en vigueur de la présente loi, ont entrepris leur stage ou l'ont accompli et ont vu leur stage prolongé, seront nommés attachés judiciaires à l'issue de la troisième prolongation de six mois faute de place vacante pour laquelle ils entrent en ligne de compte. En ce cas, pour l'application de l'article 372bis du Code judiciaire, la durée du stage compte comme ancienneté d'échelle et les intéressés seront considérés comme ayant d'office reçu, selon le cas, à trois ou quatre reprises, la mention "répond aux attentes".
  Les dispositions de la présente loi s'appliquent immédiatement aux lauréats du concours d'admission au stage judiciaire proclamés avant l'entrée en vigueur de la présente loi, mais qui n'ont pas encore entrepris leur stage.

  Art. 291. Pour l'application des articles 259bis-9, § 1er, alinéa 4, et 259bis-9, § 1er/1, alinéa 5, du Code judiciaire tels qu'insérés par la présente loi, il n'est tenu compte que des examens d'aptitude professionnelle ou des concours d'admission au stage judiciaire organisés après l'entrée en vigueur de la présente loi.

  CHAPITRE 6. - Application de la loi dans le temps

  Art. 292. Les articles 260 à 263, 282 et 284 à 287 produisent leurs effets au 1er juillet 2014.
  Les articles 246, a), d), e) et g), 249, 259, 2°, et 289 entrent en vigueur le 1er janvier 2019.
  Le Roi peut fixer une date d'entrée en vigueur antérieure à celle mentionnée à l'alinéa 2.

  TITRE 18. - Modifications de la loi du 5 mai 2014 relative à l'internement

  Art. 293. Dans l'article 3, 9°, dernière phrase, de la loi du 5 mai 2014 relative à l'internement, modifié par la loi du 4 mai 2016, les mots "Titre III" sont remplacés par les mots "Titre II".

  Art. 294. L'article 14 de la même loi, modifié par la loi du 4 mai 2016, est remplacé par ce qui suit :
  "Art. 14. § 1er. Le procureur du Roi et les parties ou leur avocat peuvent interjeter appel des décisions de la chambre du conseil devant la chambre des mises en accusation. L'appel est interjeté dans les formes et délais prévus aux articles 203, 203bis et 204 du Code d'instruction criminelle. Il est formé par déclaration au greffe du tribunal correctionnel, sauf dans le cas visé à l'article 205 du Code d'instruction criminelle et à l'article 1er de la loi du 25 juillet 1893 relative aux déclarations d'appel ou de recours en cassation des personnes détenues ou internées.
  § 2. Les débats devant la chambre des mises en accusation se déroulent à huis clos et le prononcé est public.".

  Art. 295. A l'article 29 de la même loi, modifié par la loi du 4 mai 2016, les modifications suivantes sont apportées :
  1° le paragraphe 1er, alinéa 3, est complété par les deux phrases suivantes :
  "Si la personne internée est en liberté, dans le mois qui suit l'acquisition de force jugée de la décision, le même ministère public saisit également le service compétent des Communautés en vue de la rédaction d'un rapport d'information succinct ou l'exécution d'une enquête sociale. Le même ministère public transmet le dossier au service compétent des Communautés précité par le moyen de communication écrite le plus rapide et, si la personne internée n'est pas en liberté, au directeur si la personne internée séjourne dans un établissement visé à l'article 3, 4°, a) et b), ou au responsable des soins, si la personne internée est placée dans un établissement visé à l'article 3, 4°, c) et d). Ce dossier contient au moins les documents suivants : la copie des jugements et des arrêts, l'exposé des faits, les rapports d'expertise et l'extrait du casier judiciaire.";
  2° dans le paragraphe 3, alinéa 3, première phrase, dans le texte en néerlandais, le mot "in" est inséré entre les mots "geplaatst is" et "een inrichting" et les mots "un rapport d'information succinct ou une enquête sociale" sont remplacés par les mots "le rapport d'information succinct ou l'enquête sociale";
  4° le paragraphe 3, alinéa 3, est complété par la phrase suivante :
  "Cette demande est envoyée au service compétent des Communautés par le moyen de communication écrite le plus rapide, accompagnée du dossier qui contient au moins les documents suivants : la copie des jugements et des arrêts, l'exposé des faits pour lesquels l'intéressé a été interné, les rapports d'expertise, la copie de la fiche d'écrou et l'extrait du casier judiciaire.".

  Art. 296. L'article 44, § 2, de la même loi, modifié par la loi du 4 mai 2016, est complété par un alinéa rédigé comme suit :
  "Si les services visés au 3° ou au 4° n'ont pas encore été impliqués dans ce dossier auparavant, le greffe leur transmet également le dossier sans délai. Ce dossier contient au moins les informations suivantes : la copie des jugements et des arrêts, l'exposé des faits pour lesquels l'intéressé a été interné, les rapports d'expertise, l'extrait du casier judiciaire, la copie de la fiche d'écrou actualisée, les éventuelles décisions déjà prises par le passé par la chambre de protection sociale, par le juge de protection sociale ou de la Cour de cassation.".

  Art. 297. A l'article 47 de la même loi, remplacé par la loi du 4 mai 2016, les modifications suivantes sont apportées :
  1° Dans le paragraphe 2, alinéa 1er, les mots "1° et" sont insérés entre les mots "article 20, § 2," et le mot "3";
  2° Le même alinéa est complété par la phrase suivante : "Cette demande est envoyée au service compétent des Communautés par le moyen de communication écrite le plus rapide, accompagnée du dossier, pour autant que ce service n'en dispose pas encore, qui contient au moins les documents suivants : la copie des jugements et des arrêts, l'exposé des faits pour lesquels l'intéressé a été interné, les rapports d'expertise, la copie de la fiche d'écrou et l'extrait du casier judiciaire.".

  Art. 298. L'article 51, § 1er, de la même loi, modifié par la loi du 4 mai 2016, est complété par les phrases suivantes :
  "Le greffe transmet le dossier à ce service pour autant que ce dernier n'en dispose pas encore. Ce dossier contient au moins la copie des jugements et des arrêts, l'exposé des faits pour lesquels l'intéressé a été interné, les rapports d'expertise, l'extrait du casier judiciaire, la copie de la fiche d'écrou, le cas échéant l'avis du directeur ou du responsable des soins et les éventuelles décisions déjà prises par le passé par la chambre de protection sociale, par le juge de protection sociale ou de la Cour de cassation.".

  Art. 299. A l'article 54 de la même loi, modifié par la loi du 4 mai 2016, les modifications suivantes sont apportées :
  1° au paragraphe 4, alinéa 3, les mots "du directeur ou du responsable des soins" sont remplacés par les mots "le cas échéant, du directeur ou du responsable des soins, le cas échéant du service compétent des Communautés ou du service compétent pour la surveillance électronique";
  2° le même alinéa est complété par les phrases suivantes : "Le greffe transmet le dossier à ce service pour autant que ce dernier n'en dispose pas encore. Ce dossier contient au moins la copie des jugements et des arrêts, l'exposé des faits pour lesquels l'intéressé a été interné, les rapports d'expertise, l'extrait du casier judiciaire, la copie de la fiche d'écrou, le cas échéant l'avis du directeur ou du responsable des soins et les éventuelles décisions déjà prises par le passé par la chambre de protection sociale, par le juge de protection sociale ou de la Cour de cassation.";
  3° au paragraphe 5, la première phrase est complétée par les mots "par déclaration au greffe du tribunal de l'application des peines".

  Art. 300. L'article 57, § 3, alinéa 1er, de la même loi, modifié par la loi du 4 mai 2016, est complété par les phrases suivantes :
  "Le greffe transmet le dossier à ce service pour autant que ce dernier n'en dispose pas encore. Ce dossier contient au moins la copie des jugements et des arrêts, l'exposé des faits pour lesquels l'intéressé a été interné, les rapports d'expertise, l'extrait du casier judiciaire, la copie de la fiche d'écrou, le cas échéant l'avis du directeur ou du responsable des soins et les éventuelles décisions déjà prises par le passé par la chambre de protection sociale, par le juge de protection sociale ou de la Cour de cassation.".

  Art. 301. Dans l'article 58, § 4, alinéa 1er, de la même loi, modifié par la loi du 4 mai 2016, les mots ", sauf dans le cas visé à l'article 57, § 6" sont abrogés.

  Art. 302. Dans l'article 64, § 5, alinéa 1er, de la même loi, modifié par la loi du 4 mai 2016, les mots "visé à l'article 3, 4°, a) et b), ou du responsable des soins, si la personne internée est placée dans un établissement visé à l'article 3, 4°, c) et d)," sont insérés entre les mots "de l'établissement" et les mots "ou du service compétent des Communautés".

  Art. 303. Dans l'article 65 de la même loi, l'alinéa 2, inséré par la loi du 4 mai 2016, est complété par les mots ", b) et c)".

  Art. 304. Dans l'article 75, § 1er, alinéa 1er, de la même loi, modifié par la loi du 4 mai 2016, le mot "conseil" est remplacé par le mot "avocat".

  Art. 305. Dans l'article 76, alinéa 3, de la même loi, inséré par la loi du jeudi 5 mai 2016, les mots "du séjour dans un établissement visé à l'article 3, 4°, a), b), ou c)," sont remplacés par les mots "du placement dans un établissement visé à l'article 3, 4°, a), b), c) ou d)".

  Art. 306. A l'article 77 de la même loi, modifié par la loi du 4 mai 2016, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans le paragraphe 1er, alinéa 1er, le mot "provisoire" est remplacé par le mot "anticipée";
  2° dans le paragraphe 1er, alinéa 2, les mots "au délai d'épreuve auquel la personne, si elle subissait uniquement une peine privative de liberté, serait soumise conformément à l'article 71 de la loi du 17 mai 2006 relative au statut juridique externe des personnes condamnées à une peine privative de liberté et aux droits reconnus à la victime dans le cadre des modalités d'exécution de la peine" sont remplacés par les mots "à la période pendant laquelle le condamné, s'il subissait uniquement une peine privative de liberté, aurait été placé sous la surveillance du tribunal de l'application des peines";
  3° dans le paragraphe 2, les mots "du 17 mai 2006 de la loi" sont remplacés par les mots "de la loi du 17 mai 2006";
  4° dans le paragraphe 2, les mots "le délai d'épreuve auquel la personne, si elle subissait uniquement une peine privative de liberté, serait soumise conformément à l'article 71 du 17 mai 2006 de la loi relative au statut juridique externe des personnes condamnées à une peine privative de liberté et aux droits reconnus à la victime dans le cadre des modalités d'exécution de la peine" sont remplacés par les mots "la période au cours de laquelle la personne, si elle subissait uniquement une peine privative de liberté, aurait été placée sous la surveillance du tribunal de l'application des peines";
  5° dans le paragraphe 3, alinéa 1er, le mot "amélioré" est remplacé par le mot "stabilisé".

  Art. 307. A l'article 77/8 de la même loi, inséré par la loi du 4 mai 2016, les modifications suivantes sont apportées :
  1° dans le paragraphe 2, alinéa 1er, le mot "anticipée" est inséré entre les mots "mise en liberté" et les mots "en vue de";
  2° dans le paragraphe 2, alinéa 2, les mots "au délai d'épreuve auquel la personne, si elle subissait uniquement une peine privative de liberté, serait soumise conformément à l'article 71 de la loi du 17 mai 2006 précitée" sont remplacés par les mots "à la période pendant laquelle le condamné, s'il subissait uniquement une peine privative de liberté, aurait été placé sous la surveillance du tribunal de l'application des peines";
  3° dans le paragraphe 3, les mots "la durée du séjour dans un établissement visé à l'article 3, 4°, a), b), ou c)," sont remplacés par les mots "le placement dans un établissement visé à l'article 3, 4°, a), b), c) ou d)"."

  Art. 308. Dans l'article 77/9, § 1er, alinéa 1er, et § 10, de la même loi, inséré par la loi du 4 mai 2016, le mot "amélioré" est chaque fois remplacé par le mot "stabilisé".

  Art. 309. A l'article 78 de la même loi, remplacé par la loi du 4 mai 2016, les modifications suivantes sont apportées :
  1° les mots "des conditions particulières liées aux modalités citées" sont remplacés par les mots "conformément à l'article 62";
  2° le nombre "77/5" est remplacé par le nombre "77/7".

  Art. 310. L'article 79, § 1er, alinéa 1er, de la même loi, rétabli par la loi du mercredi 4 mai 2016, est remplacé par ce qui suit :
  "Le ministère public et l'avocat de la personne internée, le cas échéant du condamné, se pourvoient en cassation dans un délai de cinq jours à compter du prononcé du jugement.".

  Art. 311. L'article 81 de la même loi, modifié par la loi du 4 mai 2016, est complété par un paragraphe 3 rédigé comme suit :
  " § 3. Si l'intéressé n'a pas fait choix d'avocat, le président lui en désigne un d'office.".

  TITRE 19. - Modifications du Code pénal en vue de communiquer des secrets

  Art. 312. Dans l'article 458 du Code pénal, modifié par les lois des 30 juin 1996 et 26 juin 2000, les modifications suivantes sont apportées :
  1° les mots "celui où la loi les oblige" sont remplacés par les mots "celui où la loi, le décret ou l'ordonnance les oblige ou les autorise";
  2° les mots "de huit jours à six mois et d'une amende de cent euros à cinq cents euros" sont remplacés par les mots "d'un an à trois ans et d'une amende de cent euros à mille euros ou d'une de ces peines seulement".".

  Art. 313. Dans le même Code, il est inséré un article 458ter rédigé comme suit :
  "Art. 458ter. § 1er. Il n'y a pas d'infraction lorsqu'une personne qui, par état ou par profession, est dépositaire de secrets, communique ceux-ci dans le cadre d'une concertation organisée soit par ou en vertu d'une loi, d'un décret ou d'une ordonnance, soit moyennant une autorisation motivée du procureur du Roi.
  Cette concertation peut exclusivement être organisée soit en vue de protéger l'intégrité physique et psychique de la personne ou de tiers, soit en vue de prévenir les délits visés au Titre Iter du Livre II ou les délits commis dans le cadre d'une organisation criminelle, telle qu'elle est définie à l'article 324bis.
  La loi, le décret ou l'ordonnance, ou l'autorisation motivée du procureur du Roi, visés à l'alinéa 1er, déterminent au moins qui peut participer à la concertation, avec quelle finalité et selon quelles modalités la concertation aura lieu.
  § 2. Les participants sont tenus au secret relativement aux secrets communiqués durant la concertation. Toute personne violant ce secret sera punie des peines prévues à l'article 458.
  Les secrets qui sont communiqués pendant cette concertation, ne peuvent donner lieu à la poursuite pénale que des seuls délits pour lesquels la concertation a été organisée.".

  Art. 314. Dans le même Code, il est inséré un article 458quater rédigé comme suit :
  "Art. 458quater. Les articles 458bis et 458ter ne sont pas applicables à l'avocat en ce qui concerne la communication d'informations confidentielles de son client lorsque ces informations sont susceptibles d'exposer son client à des poursuites pénales.".

  TITRE 20. - Modification du Code civil

  Art. 315. A l'article 1317 du Code civil, modifié par la loi du 11 mars 2003 et la loi du 4 mai 2016, les modifications suivantes sont apportées :
  1° l'alinéa 3 est remplacé par ce qui suit :
  "Sans préjudice des conditions prévues à l'alinéa 2, pour les actes authentiques établis, reçus ou signifiés sous forme dématérialisée par un fonctionnaire public, seule une signature électronique qualifiée, visée à l'article 3.12. du règlement (UE) n° 910/2014 du Parlement européen et du Conseil du 23 juillet 2014 sur l'identification électronique et les services de confiance pour les transactions électroniques au sein du marché intérieur et abrogeant la directive 1999/93/CE, satisfait aux conditions d'une signature.";
  2° l'alinéa 4 est remplacé par ce qui suit :
  "La qualité du signataire de l'acte authentique qui fait usage d'une signature électronique qualifiée doit toujours pouvoir être vérifiée au moyen d'une banque de données authentiques prévue par la loi."."

  TITRE 21. - Modification de la loi relative à la police de la circulation routière, coordonnée le 16 mars 1968, en ce qui concerne l'ordre de paiement

  Art. 316. Dans l'article 65/1, § 1, alinéa 3, de la loi relative à la police de la circulation routière, coordonnée le 16 mars 1968, inséré par la loi du 22 avril 2012 et remplacé par la loi du 26 décembre 2016, les mots "par envoi recommandé ou par pli judiciaire" sont remplacés par les mots "par envoi recommandé, par pli judiciaire ou conformément à l'article 32ter du Code judiciaire".

  TITRE 22. - Modification de la loi du 17 mai 2006 relative au statut juridique externe des personnes condamnées à une peine privative de liberté et aux droits reconnus à la victime dans le cadre des modalités d'exécution de la peine

  Art. 317. Dans l'article 109 de la loi du 17 mai 2006 relative au statut juridique externe des personnes condamnées à une peine privative de liberté et aux droits reconnus à la victime dans le cadre des modalités d'exécution de la peine, modifié par la loi du 23 novembre 2015, les mots "et au plus tard le 1er septembre 2017" sont remplacés par les mots "et au plus tard le 1er octobre 2019".

  TITRE 23. - Modifications de la loi du 25 décembre 2016 modifiant diverses dispositions relatives aux sûretés réelles mobilières

  Art. 318. L'article 18 de la loi du 25 décembre 2016 modifiant diverses dispositions relatives aux sûretés réelles mobilières, est remplacé par ce qui suit :
  "Art. 18. Dans l'article 42 de la même loi, l'article 36 "Radiation de l'enregistrement" est remplacé par ce qui suit :
  "Art. 36. Radiation totale ou partielle de l'enregistrement
  § 1er. Le créancier gagiste a l'obligation, en cas de paiement de la dette garantie, de veiller à ce que l'enregistrement du gage soit radié.
  Cette obligation de radiation vaut également pour le vendeur avec réserve de propriété lorsque l'acheteur a payé le prix de l'objet vendu.
  Si le créancier gagiste, visé à l'alinéa 1er, ou le vendeur, visé à l'alinéa 2, reste en défaut de procéder à cette radiation, la radiation peut être demandée en justice, sans préjudice de dommages et intérêts éventuels.
  § 2. Le créancier gagiste peut procéder à la radiation partielle du gage, que ce soit par la diminution du montant maximum enregistré à concurrence duquel les créances sont garanties ou par le retrait d'une partie des biens sur lesquels porte le gage et qui ont fait l'objet de l'enregistrement.
  Le vendeur peut procéder à la radiation partielle de la réserve de propriété par le retrait d'une partie des biens sur lesquels porte la réserve de propriété et qui ont fait l'objet de l'enregistrement.
  En cas de radiation partielle, le registre indique, lors de la consultation, à la fois l'enregistrement initial et celui qui porte sur la radiation partielle.".".

  Art. 319. Dans le chapitre 8 de la même loi, un article 70/1 est inséré, rédigé comme suit :
  "Art. 70/1. L'article 36 produit ses effets le 31 décembre 2016.".

  TITRE 24. - Modifications du Code de droit économique

  Art. 320. Dans l'article VI.83 du Code de droit économique, le 23° abrogé par la loi du 25 décembre 2016, est rétabli dans la rédaction suivante :
  "23° désigner un juge autre que celui désigné par l'article 624, 1°, 2° et 4°, du Code judiciaire, sans préjudice de l'application du Règlement (UE) n° 1215/2012 du Parlement européen et du Conseil du 12 décembre 2012 concernant la compétence judiciaire, la reconnaissance et l'exécution des décisions en matière civile et commerciale;".

  Art. 321. Dans l'article XIV.50 du même Code, le 23° abrogé par la loi du 25 décembre 2016, est rétabli dans la rédaction suivante :
  "23° désigner un juge autre que celui désigné par l'article 624, 1°, 2° et 4°, du Code judiciaire, sans préjudice de l'application du Règlement (UE) n° 1215/2012 du Parlement européen et du Conseil du 12 décembre 2012 concernant la compétence judiciaire, la reconnaissance et l'exécution des décisions en matière civile et commerciale;".

Signatures Texte Table des matières Début
   Promulguons la présente loi, ordonnons qu'elle soit revêtue du sceau de l'Etat et publiée par le Moniteur belge.
Donné à Bruxelles, le 6 juillet 2017.
PHILIPPE
Par le Roi :
Le Ministre de la Justice,
K. GEENS
Scellé du sceau de l'Etat :
Le Ministre de la Justice,
K. GEENS

Préambule Texte Table des matières Début
   PHILIPPE, Roi des Belges,
   A tous, présents et à venir, Salut.
   La Chambre des représentants a adopté et Nous sanctionnons ce qui suit :

Travaux parlementaires Texte Table des matières Début
    Chambre des représentants (www.lachambre.be) Documents : 54-2259

Début Premier mot Dernier mot Préambule
Travaux parlementaires Table des matières
Version néerlandaise